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है। गांधी की बातों से जिनकी संतुष्टि नहीं होती, उनका मेरी बातों से भला क्या समाधान होगा! इसके बावजूद कोशिश तो करनी ही पडे़गी। महारों से लेकर भंगी समाज तक सबके साथ अपनी एकता होनी जरूरी है। इस पूरे समाज की उन्नति के लिए कोशिश करना ही मेरा ऊंचा ध्येय है और इस बारे में सभी लोगों को अपने हृदय में एक-दूसरे के प्रति विश्वास रखना चाहिए।
मेरी गैरहाजिरी में यहां के अखबारों में मेरे बारे में अनर्गल हल्ला मचाया गया था। मुझे राष्ट्रद्रोही करार देने की यहां के कट्टर राष्ट्रप्रेमी पत्रकारों ने यथासंभव कोशिश की थी। इसके बावजूद मेरे भाई-बहनों ने मुझ पर अटल विश्वास रखते हुए अपना कार्य उत्साह के साथ आगे बढ़ाने की हरसंभव कोशिश की, इस बारे में मुझे बेहद संतोष है। गोलमेज सम्मेलन में मैंने गांधी का विरोध किया, इसके लिए मैं भले ही राष्ट्रद्रोही करार दिया गया हूं, लेकिन मुझे इन आरोपों से जरा भी डर नहीं लगता। उलटे अपने बंधुओं को गुलामी से मुक्ति दिलाने जैसे उच्च कार्य में महात्मा कहलाने वाले व्यक्ति द्वारा जी-जान से विरोध किया जाना दुनिया की नजर में कितना अन्यायपूर्ण है, यह सोचनेवाले खुद तय करें। मेरी मनोदेवता मुझसे कहती है कि मैं सही रास्ते जा रहा हूं, इसलिए स्वार्थी लोगों द्वारा लगाए जानेवाले आरोपों की मुझे बिल्कुल परवाह नहीं करनी चाहिए। मैं राष्ट्रद्रोही हूं, देशद्रोही हूं ऐसा आज जो लोग कह रहे हैं, वे भविष्य में मेरे कार्य के बारे में प्रशंसात्मक बोलेंगे, इस बारे में मुझे कोई शक नहीं है। आज का तूफानी दौर कल जब खत्म होगा, गोलमेज सम्मेलन के कुल कार्य पर जब ठंडे दिमाग से सोचा जाएगा, तब मुझे पूरा यकीन है कि उनका मेरे बारे में विचार बदलेगा। यहां राष्ट्रीय अखबारों में आनेवाली खबरों में और वहां के गोलमेज सम्मेलन के कामकाज में कितना फर्क था, यह भी वे जान जाएंगे। और मुझे यकीन है कि हिंदुओं की अगली पीढ़ी यही कहेगी कि मैंने राष्ट्र के लिए बेहतर काम किया।
मेरी और गांधी की विलायत जाने से पूर्व ही पहली मुलाकात हुई थी और इस बारे में आप सब लोग जानते हैं। गोलमेज परिषद के कार्यक्रम में महात्मा गांधी और मेरे बीच चार-चार पांच-पांच घंटों की बातचीत हुई है। लेकिन उन्होंने आखिर में साफ-साफ बताया था कि मुसलमान और सिक्ख समाज के अलावा अन्य किसी समाज को वे स्वतंत्र चुनाव क्षेत्र नहीं दे सकते। अल्पसंख्यक समिति के मुसलमान प्रतिनिधि और मुझमें एकता न हो, मुसलमान मुझे अपनी सहायता न दें, इसके लिए महात्मा गांधी ने कैसी भेदनीति अपनाई थी, इस बारे में पुख्ता सबूत, कागजातों समेत मेरे पास मौजूद हैं। उनके कारण मेरे मन में यह आशंका पनपती है कि वे महात्मा पद के लिए कहां तक योग्य हैं? गांधी की कोशिशों को मुसलमानों ने साफ नकार दिया तो वे चिढ़ गए। मार्केट से उन्होंने एक कुरान खरीदी और एच. एच. आगाखान