47. स्वाभिमान और आजादी का दीप कभी ना बुझने दें - जनवरी 1932 मुंबई - Page 291

274 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

जिस होटल में रहते थे, वहां वे गए। उनके सामने कुरान रख कर उन्होंने कहा, कि कुरान में कहीं ये लिखा हो तो दिखा दीजिए कि हिंदू-हिंदू के बीच फूट डालें। उस समय मि. आगाखान ने बस इतना ही कहा कि अस्पृश्य समाज हमारे समाज से बहुत ज्यादा पददलित है। हम जब अपने न्यायपूर्ण अधिकारों की मांग कर रहे हैं, उनके लिए लड़ रहे हैं, ऐसे में उनकी अपनी न्यायपूर्ण मांगों की लड़ाई का हम कैसे विरोध करेंगे? उनका जवाब सुन कर गांधी उल्टे पैर अपने निवासस्थान को लौटे।

गांधी की तरह आप मेरी बिना वजह प्रशंसा कर मुझे देवत्व न दें। किसी को देवता बना कर अन्य अंधों की तरह उसके पीछे चलते रहना, यह कम से कम मुझे तो अपनी कमजोरी की ही निशानी लगती है। आप अपना संगठन बनाएं और अनुशासन से, हिम्मत से अपनी सर्वांगीण उन्नति साध्य करें।“

डॉ. अम्बेडकर के भाषण के बाद उन्होंने नासिक के मंदिर प्रवेश सत्याग्रह में सजा भुगत कर लौट आए सत्याग्रही वीरों का उनके गले में पुष्पहार पहना कर सम्मान किया। साथ ही सातारा जिले के अस्पृश्य समाज के चित्रकला सीखने वाले श्री. सावंत का जे. जे. आर्ट स्कूल की चित्र प्रदर्शनी में बेहतर चित्र के लिए प्रशस्तिपत्र पाने और भावनगर के महाराजा द्वारा दिया जाने वाला दो सौ रुपयों का पुरस्कार पाने के लिए अभिनंदन किया। इस अवसर पर उसे नगर जिले की ओर से एक स्वर्णपदक और पुष्पहार अर्पण किया गया।

उसके बाद देर रात तक डॉ. अम्बेडकर और अन्य प्रांतीय नेताओं से विचार-विमर्श हुआ।