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”मद्रास की अस्पृश्य जनता, तथा अन्य लोगों द्वारा व्यक्त किए गए अपनत्व के लिए मैं सबके प्रति आभार प्रकट करता हूं। अब तक अस्पृष्य समाज में अपने हकों के बारे में एकमत था और समाज पर उसका असर भी होता रहा। रावबहादुर एम. सी. राजा ने अचानक बिना किसी वजह के इस एकता को भंग किया और इस कारण पहले भी जो राह आसान नहीं थी वह अब और अधिक मुश्किल हो गई है। डॉ. मुंजे की भेद नीति का रावबहादुर राजा बहुत जल्द और अचानक शिकार हो गए हैं। रावबहादुर राजा अगर थोड़ा और सब्र कर लेते और पहले जो बात उन्होंने जाहिर की थी, उसके अनुसार अगर नागपुर में सभा लेकर अस्पृश्य जनता का मत आजमाते और डॉ. मुंजे के साथ करार करते तो अपने समाज के लिए रा. ब. राजा अधिक सुविधाएं और अधिक लाभ पा सकते थे। आज उन्होंने कुछ सफेदपोश नेताओं की निजी और शाब्दिक वाहवाही के अलावा कुछ भी नहीं पाया है। डॉ. मुंजे के साथ मेरी भी कई बार बातचीत होती रही है उनके साथ मैंने ‘पैक्ट’ नहीं किया, लेकिन उनके मेरे बीच कोई व्यक्तिगत वैर भावना नहीं है। परंतु मैं जानता हूं और डॉ. मुंजे भी जानते हैं कि वे अस्पृश्यता के सामने लाचार हैं। भेद डालने जैसी आसान बात ही वे कर पाए, क्योंकि यही एक बात बस वे कर सकते थे। लेकिन स्पृश्य जनता की मनोभावना में बदलाव लाना उनकी पहुंच से बाहर की बात थी। मैं यह जान चुका इसलिए उनकी व्यक्तिगत भेदनीति का असर मैंने अपने ऊपर पड़ने नहीं दिया। लेकिन रावबहादुर राजा को आसानी से वे अपनी गिरफ्त में ले पाए। इतनी आसानी से रावबहादुर राजा उनके चंगुल में न आते तो बेहतर होता।
संयुक्त चुनाव क्षेत्र, वोट डालने का सार्वजनिक अधिकार और अस्पृश्यों के लिए आरक्षित जगहें हों, इन बातों को मैंने निजी तौर पर पहले ही स्वीकार किया था। लेकिन मेरा मत देखने में भले राष्ट्रीय और व्यापक हो, किन्तु अस्पृश्य जनता का इससे बिल्कुल फायदा नहीं होने वाला है और इस बात के बारे में आप ही की कई संस्थाओं ने मुझे चेताया है। नागपुर में जैसे ही मैंने संयुक्त चुनाव क्षेत्र की बात को स्वीकारा तो रावबहादुर राजा ने मेरे बारे में कितना हल्ला मचाया था, यह बात आपमें से कई लोगों को आज भी अच्छी तरह याद होगा। कल-परसों तक रावबहादुर राजा का और अन्य प्रमुख नेताओं का मुझ पर लगातार दबाव बना हुआ था। ऐसे हालात में मैं अपनी निजी पसंद को परे रख कर अस्पृश्यों को जो चाहिए उसको स्वीकार किया इसमें बुरा क्या किया? इसके अलावा, गोलमेज परिषद में किन हालात में हम फंसे थे और वहां अल्पसंख्यकों का जो समझौता हुआ उसके लिए अस्पृश्यों की ओर से समर्थन देना किस प्रकार जरूरी और आवश्यक था, यह बात भी रावबहादुर राजा को अच्छी तरह पता है। इस करारनामे के बारे में अपनी सहमति और संतोष व्यक्त करते हुए कल-परसों तक उन्होंने मुझे पूरा समर्थन दिया था। लेकिन अब वे इस