4
समाज जीवन में निरपेक्ष कर्तव्य भावना से संघर्ष करना चाहिए *
समाज जीवन में निरपेक्ष कर्तव्य भावना से संघर्ष करना चाहिए
सोलापुर जिले के बार्शी में मई 1924 में हुए मुंबई प्रांतीय बहिष्कृत सम्मेलन में
बैरिस्टर अम्बेडकर का भाषण हुआ। उन्होंने अपने भाषण में कहा-
”हम धन्यभागी हैं कि अस्पृश्यता ने हमें गुलाम का दर्जा नहीं दिया। अन्यथा परचून
की दुकानों की चीजों या जानवरों की तरह हमारी भी खरीद फरोख्त होती। लेकिन
इस तरह की गुलामी के हम शिकार नहीं बने इसके लिए संतोष प्रगट करने की
जरूरत नहीं है। यदि इस तरह की गुलामी होती तो उससे हम जल्दी ही छूट जाते।
प्राचीनकाल में यूनान और रोम में गुलामी की प्रथा थी। कई कारणों से उस देश के
लोगों पर गुलाम बनने की नौबत आती थी। और एक बार मनुष्य गुलामों की सूची
में शामिल होता था तो उसकी स्थिति किसी जड़ वस्तु की तरह हो जाती थी और
वह सारे नागरिक अधिकारों से वंचित हो जाता था। हिन्दुस्तान के अछूत लोग रोमनों
की तरह जड़ वस्तुओं की स्थिति में नहीं पहुंचे, इस दृष्टि से कोई कहे कि भारत की
अस्पृश्यता रोमन और यूनान की गुलामी की प्रथा से अच्छी है तो वह एक तरह से
सही भी होगा। लेकिन एक अन्य दृष्टि से देखें तो अस्पृश्यता गुलामी की प्रथा से भी
ज्यादा बुरी स्थिति है। रोम का इतिहास इस बात की गवाही देता है कि गुलाम लोग
गुलामी से मुक्त होकर स्वतंत्र नागरिक की स्थिति में जा पहुंचे मगर हिंदुस्तान के
इतिहास में अस्पृश्यों से स्पृश्य बनने का एक भी उदाहरण नहीं दिखाई देता। रोमन
समाज की गुलामी की प्रथा एक कालविशेष की स्थिति थी उससे छुटकारा पाने के
कई रास्ते थे। इसके विपरीत अस्पृश्यता त्रिकालबाधित स्थिति है और उससे मुक्ति
का कोई रास्ता नहीं है। जो जन्म से अस्पृश्य है वह मृत्यु तक अस्पृश्य ही रहेगा इस
कठोर नियम के कारण सदियां गुजर जाने के बावजूद अस्पृश्य समाज अस्पृश्य ही
है। इसके अलावा कई मामलों में भी यह कहना पडे़गा कि हिंदुस्तान की अस्पृश्यता
रोमनों की गुलामी की प्रथा से भी ज्यादा बुरी है। यह कहने में कोई एतराज नहीं है
कि रोम में गुलामी की प्रथा गुलामों की प्रगति में जितनी बाधक थी उससे कई गुना
ज्यादा हमारी अस्पृश्यता, हमारी प्रगति में बाधक बन रही है। हम पर आरोप लगाए
जाते हैं कि ये गंदा व्यवसाय करते हैं, जानवरों को काटते-छीलते हैं। गटर-नालों की
सफाई करते हैं, गंदे कपड़े पहनते हैं, अभक्ष भक्षण करते हैं, अनेक प्रकार के वीभत्स
देवि-देवताओं की पूजा करते हैं; ऐसे एक दो नहीं बल्कि नौ लाख आरोप हम पर
लगाए जाते हैं। आरोप करना बहुत आसान है मगर आरोप करने वाले इस बात का
विचार नहीं करते कि इन आरोपों के लिए जिम्मेदार कौन है।
* ज्ञानप्रकाश : 24 मई, 1924, और 7 जून, 1924