4. समाज जीवन में निरपेक्ष कर्तव्य भावना से संघर्ष करना चाहिए - मई 1924 मुंबई - Page 31

14 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

सच कहा जाए तो आरोप करने वाले ही उसके लिए जिम्मेदार हैं। मनुष्य समाज की एक के बाद एक कई पीढि़यां खत्म हो जाती हैं मगर अगली पीढ़ी हमारे सभी संप्रदाय अपनी पिछली पीढ़ी से रीति-रिवाज, धर्मभावना आदि सारी संस्कृति सीख लेती है। यही कारण है कि समाज के घटक लुप्त होने पर भी समाज निरंतर चलता रहता है। आज के हिंदु समाज में इस तरह का संगठन बिल्कुल नहीं हो पाता। हमारे इन तथाकथित भूदेवताओं के साथ हमारे नजदीकी संबंध तो कभी बन ही नहीं पाए तो फिर हम उनके रीति-रिवाज कैसे ग्रहण करें? उपनिषदों के सिद्धांत वे हमें बताने को तैयार ही नहीं हैं तो हमारी मरी माता की पूजा के संस्कार जाएंगे कैसे? अगर उनका आदेश है कि हम वेद न सुनें तो हमसे लावणी (नौटंकी) छूटेगी कैसे? यदि उन्होंने तय किया कि हमारा उपनयन संस्कार करके जनेऊ पहनाई जाए तो क्या हम शुचिर्भूत नहीं रहेंगे? सारांश यह है कि हम पर आरोप लगाया जाता है कि हममें बहुत बुराइयां हैं तो हम पूछते हैं कि अच्छाई की सीख हमें कब किसने दी? ब्राह्मणों के बच्चों में ब्राह्मणों के रीति-रिवाज या हममें से ईसाई बने लोगों में ईसाई रीति-रिवाजों का चलन कैसे होता है? और ब्राह्मणों के रीति-रिवाजों का संस्कार हम अस्पृश्यों में क्यों नहीं होता? इस पर बारीकी से विचार करें तो आसानी से समझ में आने जैसी बात है कि इस तरह के संस्कार के लिए दोनों पक्षों में प्रेम, नजदीकी व अन्योन्य संबंध होने चाहिएं। अस्पृश्यता के कारण हिंदु समाज के उच्च वर्णियों के साथ इस तरह का संबंध प्रगाढ़ होना संभव नहीं है। इस कारण हर समाज के अच्छे-बुरे रीति-रिवाज उस समाज के साथ चिपके रहते हैं। रोमन समाज की गुलामी की प्रथा में ऐसी अस्पृश्यता का समावेश न होने के कारण उच्च वर्णियों की जीवनशैली हमेशा उनके आंखों के सामने रहती थी और इतना ही नहीं वे उसका अनुसरण करते थे।

अस्पृश्यता के कारण ऐसा व्यवहार होने से हमारे सभी लोगों का ध्यान इस बात पर केंद्रीत है कि कैसे यह कलंक दूर हो। इसके लिए कई तरह के उपाय सुझाए जाते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि अस्पृश्य लोग देशांतर करें। ऐसा सुना जाता है कि जिस दिन निराश्रित सहायकारी मंडल की स्थापना हुई उस दिन एक उच्चवर्णिय व्यक्ति ने विचार प्रकट किए कि ये अस्पृश्य लोग अपनी पीड़ा को लेकर किसी दूसरे देश में क्यों नहीं चले जाते? संतोष की बात यह है कि ऐसे तिरस्कारयुक्त उपदेश देने वाले लोग आज उच्च वर्ग में बहुत ज्यादा नहीं हैं। यह कहने में हर्ज नहीं है कि यदि हम केवल अपने लोगों के हितों के नजरिए से विचार करें तो देशांतर का यह सुझाव काफी हितकारी है। रोटी के चौथाई टुकडे़ के लिए सारे गांव के छोटे-बडों की लातें खाने की बजाए फिजी, ईस्ट आफ्रीका, न्यू गिनी आदि देशों में जाकर अपना भाग्य आजमाना कभी भी हितकारी ही होगा। दुर्भाग्य की बात यह है कि भारत के लोग जब विदेशों में जाते हैं तो उन्हें वहां के लोगों के बराबर अधिकार