53. भगवान के दर्शन के बिना कोई मरता नहीं - मई 1932 निपाणी (बेलगांव) - Page 307

290 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

दि.ब. लट्ठे ने तालियों की गड़गड़ाहट के बीच अध्यक्षस्थान ग्रहण किया। इसके बाद डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने जवाबी भाषण दिया। उन्होंने कहा,

दि. ब. लट्ठेसाहब और सज्जनों!

आपने मुझे यहां ले आने का अवसर तैयार किया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं।

आज देश में देशद्रोही, देश के लिए घातक, हिंदू धर्म विघातक तथा हिंदू-हिंदू में फूट डालने वाला जिसे कहा जाता है, देश का सबसे बडा दुश्मन अगर किसी को कहा जा रहा हो, तो वो मैं ही हूं। लेकिन यह आंधी-तूफानी वातावरण जब शांत होगा, गोलमेज सम्मेलन के कार्य की यदि आज के मेरे आलोचक ध्यानपूर्वक छानबीन करेंगे तो उन्हें यह बात माननी ही होगी, कि डॉ. अम्बेडकर ने राष्ट्र के लिए कुछ किया ही है। अगर यह बात आजकल का दूषित वातावरण बदलने के बाद भी अगर उन्होंने नहीं मानी तो भी मैं उन्हें फूटी कौड़ी की कीमत नहीं दूंगा। मेरे काम पर मेरे दलित समाज को विश्वास है। यही सबसे बड़ी उपलब्धि, सबसे बड़ी बात मैं समझता हूं। और जिस समाज में मेरा जन्म हुआ है, जिनके बीच मेरा उठना-बैठना है, जिनके बीच ही मुझे मरना है उन्हीं के लिए मैं काम कर रहा हूं, करता रहने वाला हूं। आलोचना करने वालों की मुझे फिकर नहीं है। मुझ पर आरोप है कि मैं देश का काम नहीं करता। पिछले सौ सालों से सुधारक हो या दुर्धारक, उग्रवादी हों या उदारवादी राष्ट्र के नाम पर अपनी जाति के लोगों का पेट पाला जा रहा है। उन लोगों ने मेरे समाज के लिए कुछ भी नहीं किया है। फिर वे मुझ से ही राष्ट्र के कार्य की उम्मीद क्यों करते हैं? मुझे अपने समाज की सेवा करनी चाहिए।

महाड, नासिक और अन्य जगहों पर हुए सत्याग्रहों से मुझे यकीन होता चला है कि हिंदू लोगों के अंतःकरण पत्थर-गारे से बनी दीवार की तरह मुर्दा है। वे इंसान को इंसान समझना, दूसरों को उनके हक देना जरूरी नहीं समझते। पत्थर की दीवार पर सिर पटकेंगे तो खून ही निकलेगा। दीवार की कठोरता कम नहीं होगी। इसीलिए इस बारे में मेरा पूरी तरह मत परिवर्तन हो चुका है। आज तक हमें हिंदुओं के भगवान के दर्शन नहीं हुए, इसलिए हम मरे नहीं या आज तक हिंदुओं के मंदिरों में जाने वाले गधे, कुŸो, बिल्लियां वगैरा प्राणी इंसान बने नहीं। वे यदि हमें छूना नहीं चाहते, तो हम भी उन्हें अपने को छूने नहीं देंगे।

अबके बाद हम केवल सरकारी अधिकारियों के तंबू गाड़ने वाले या साफ-सफाई करने वाले नहीं रहेंगे। अन्य लोगों की तरह हम भी राजनीतिक सŸा को हाथ में लेंगे, और अपनी सामाजिक स्वतंत्रता को स्थापित करेंगे। हम निश्चय करते हैं कि अबके बाद हम किसी के भी गुलाम नहीं रहेंगे।“ उसके बाद डॉ. अम्बेडकर ने भाषण पूरा किया। फिर यह समारोह 7-8 हजार लोगों की तालियों की गूंज के साथ समाप्त हुआ।