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सोमवार, दिनांक 5 सितंबर, 1932 के दिन रात 9 बजे लोगों के आग्रह के कारण मुंबई के वडाला में हुई सभा में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर उपस्थित रहे। यह सभा वाई.एम.सी.ए के भव्य मैदान में आयोजित की गई थी। बारिश की भले ही कृपा दृष्टि हुई थी, लेकिन 3000 लोगों का हुजूम वहां इकट्ठा हुआ था। ठीक नौ बजे बाबासाहेब सभास्थल पर हाजिर हुए। फाटक के पास तानाजी बालवीरों ने उन्हें सलामी दी। इस सभा की सारी व्यवस्था वडाला के गेंदाजी गायकवाड़ के स्काऊट ने की।
बालवीरों का गायन शुरू में ही रखा था। उनके गायन के बाद श्री मोगल मारूती गायकवाड़ ने स्थानीय लोगों की तरफ से बाबासाहेब से विनति की कि वे दो शब्द कहें,
डॉ. अम्बेडकर ने अपने भाषण में कहा,
”गणेशोत्सव के कार्यक्रम में मुझे भाग लेना है, यह सोच कर कुछ समय तक मुझे थोड़ा-सा अटपटा लगा था और मैं गणपती की मूर्ति के बारे में कुछ बोलने वाला था। किंतु मुझे यहां कहीं भी गणपति की मूर्ति दिखाई नहीं दी, इसलिए मैं यहां अब कुछ बोलूंगा नहीं। इस हिंदू धर्म ने हमारा जितना अकल्याण किया है, उतना नुकसान किसी छूत की बामारी ने भी नहीं किया है। मैं आपसे नहीं कहूंगा कि आप इस हिंदू धर्म से चिपके रहें। अब तक 2000 (दो हजार) सालों से हम इस धर्म में रहते आए हैं। जिन्हें हमने खड़ा किया, जिसकी रक्षा करने में हमारी पूरी जिंदगी बर्बाद हो गई, उसी हिंदू धर्म में हमारी कीमत फूटी कौड़ी जितनी भी नहीं है। कुछ दिनों पहले हमें काशी के ब्राह्मणों के खत आए हैं कि हम आपके लिए काशी विश्वेश्वर के मंदिर खोल देते हैं। लेकिन हमें पत्थर के मंदिरों की जरूरत नहीं है। हमने जो यह संग्राम छेड़ा है, वह केवल हमारे लिए मंदिरों के दरवाजे
खोले जाएं, इसके लिए नहीं और न ही काई जमे तालाबों का पानी हमें पीने के लिए मिले, इसलिए भी नहीं। हमें ब्राह्मणों के घरों में नहीं जाना है। हमें सहभोजन भी नहीं करना है। अस्पृश्यों के लिए ब्राह्मणों की लड़कियां ब्याहना भी हम नहीं चाहते। हमारे समाज में क्या लड़कियों की कमी है जो हम ब्राह्मणों की ल़ड़कियां चाहने लगे? ऐसा भी नहीं कि हमारी स्त्रियां बच्चे नहीं जन सकतीं और या फिर उनके जने बच्चों के जननांग नहीं होते। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। सो, मैं यह कहना चाहता हूं कि हमारा यह संघर्ष केवल राजनीतिक सŸा पाने के लिए है। हिंदुओं
जनता, 10 सितंबर, 1932