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प्राप्त नहीं होते मगर फिर भी मुझे विश्वास है कि विदेश में हिंदुस्तानी होने की वजह से जो तकलीफ होगी वह अपने देश में हिंदु होने के कारण मिलने वाली तकलीफ से कभी भी ज्यादा नहीं होगी। इसमें भी कोई शंका नहीं है कि हमारे देश में हिंदू धर्म के बंधनों के कारण धनार्जन के जो रास्ते बंद हैं वे पूरी तरह खुल जाएंगे और हम लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार आएगा।
लेकिन सभी लोगों के लिए देशांतर करना संभव नहीं है। थोड़े बहुत लोग ही यह कर सकते हैं। इसलिए इस देश में रह कर भी अस्पृश्यता निर्मूलन के रास्ते
खोजने चाहिए। इसी तरह का दूसरा मार्ग है धर्मांतरण। किसी भी धर्म की ओर हमें सैद्धांतिक दृष्टि के अलावा व्यावहारिक दृष्टि से भी देखना चाहिए। मेरी राय है कि हिंदू धर्म किसी भी धर्म से तत्त्व के आधार पर हार खाने वाला नहीं है। सभी में एक ही आत्मा का वास है यह हिंदू धर्म का मूल सिद्धांत है। यदि इस उदाŸा सिद्धांत के आधार पर समाज की रचना होती तो जिस तरह दीपक यह भाव नहीं रखता कि केवल घर के लोगों को प्रकाश देता रहेगा, और दूसरों को अंधेरा, या जिस तरह वृक्ष उसे काटने वाले और उसे पानी देने वाले दोनों को ही छाया देता है या जिस तरह से गाय की प्यास बुझाने वाला पानी शेर के लिए विष बन कर उसे मार नहीं डालता उसी तरह अगर हिंदुओं में भी सम बुद्धि होती तो अच्छा होता! लेकिन हिंदू समाज का व्यावहारिक रूप कितना घिनौना हो गया है? आचार और विचार में कहीं तालमेल है क्या? क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि जो लोग सभी में एक ही आत्मा के वास होने की बडी बड़ी घोषणाएं करते हैं उन्हीं लोगों ने मनुष्य जैसे दूसरे मनुष्य को अपवित्र और अस्पृश्य माना, लेकिन इससे भी ज्यादा गुस्सा दिलाने वाली बात यह है कि जो लोग हिंदू धर्म में आस्था नहीं रखते उन्हें उच्चवर्णिय हिंदू समदृष्टि से देखते हैं। ईसाई अपवित्र भी नहीं और अस्पृश्य भी नहीं। उच्चवर्णिय हिंदू उनके स्पर्श से प्रदूषित नहीं होते न ही उनके मातहत काम करने में कमतर महसूस करते हैं। इसी तरह यह कहना पडे़गा कि एक तरह से मुसलमान हिंदू समाज की किसी भी बहुत छोटी जाति से भी ज्यादा अस्पृश्य और अपवित्र हैं क्योंकि कोई भी हिंदू गोहत्या करके उसके मांस से अपनी जीविका नहीं चलाता। मुसलमानों और ईसाइयों में ऐसा करने पर कोई पाबंदी नहीं है। फिर भी महार, मांग और धेड आदि हिंदुओं की तुलना में उन्हें स्पर्श योग्य माना जाता है। उनके और उच्चवर्णीय हिंदुओं में हर तरह का बाह्य व्यवहार होता है। उनके बच्चे एक ही स्कूल, एक ही क्लास में पढ़ते हैं। वे एक ही रास्ते से आते जाते हैं। एक कुएं से पानी भरते हैं और अन्य मामलों में समान वृŸा से व्यवहार करते हैं। मगर हम हमारे वैदिक धर्म का अनुकरण करने वालों के आचार-विचार का हिंदू लोग हमारा तिरस्कार करते हैं। इतना ही नहीं तो हमें जानवरों से भी बदतर माना जाता है।