54. आज हमारा संघर्ष राजनीतिक सत्ता के लिए है - सितंबर 1932 वडाला (मुंबई) - Page 310

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80 से 90 प्रतिशत मजदूरों की बस्ती है, उसमें से 2-3 जगहें अस्पृश्यों को मिलेंगी। साथ ही, मुंबई जैसी जगह जहां अस्पृश्यों की बस्ती है, वहां से भी हम एक दो सीटें जीत सकते हैं। इसके अलावा नासिक जिला, पुणे से पृथक चुनाव क्षेत्र से हम जिन्हें चुन कर लाएंगे, वे हमेशा नब्बे फीसदी हमारी मुट्ठी में रहेंगे।

मुंबई कौंसिल में कुल 200 जगहें हैं। उनमें से 97 हिंदुओं के लिए हैं, 63 मुसलमानों के लिए और 10 अस्पृश्यों के लिए हैं। इसलिए, किसी एक पार्टी को ज्यादा सŸा मिलना असंभव है। क्योंकि कौंसिल में जो भी कामकाज चलेगा वह बहुमत से ही चलेगा। किसी भी पक्ष के बहुमत के लिए उसकी तरफ कम से कम 115 वोट होना जरूरी है। इसीलिए केवल हिंदुओं के 97 लोग (जगहें) बहुमत नहीं

खड़ा कर सकते। उसी तरह मुसलमान भी 63 मतों के सहारे राजसŸा चला नहीं सकते। बहुमत के लिए उन दोनों को अस्पृश्यों के मत मिलना जरूरी है। इस तरह अपने हाथ में बहुत बड़ी सŸा मिली है। क्योंकि, हम जिस तरफ अपने मत देंगे उस तरफ का पलड़ा भारी हो जाएगा और विरोधी पलड़ा ऊपर ही लटकता रह जाएगा। इतनी सŸा हमारे हाथ आई है लेकिन एक भयानक आशंका ने मुझे घेरा है। वह यह कि, आपमें मतदान करने की अकल कितनी है? आज आपको जो दस जगहें मिली हैं उन जगहों पर अपने जो लोग जाएंगे वे जो भी काम चाहे कर सकेंगे। वे पूरी मुंबई को घुमा सकते हैं। लेकिन उन जगहों का सही इस्तेमाल होना चाहिए। केवल ये 10 लोग सभी अस्पृश्यों का उद्धार कर सकते हैं। इतने दिनों तक कोई छोटा-सा भी काम क्यों न हो मामलतदार या कलक्टर के यहां कई-कई चक्कर काटने पड़ते थे। वरिष्ठ अधिकारियों की मर्जी रखनी पड़ती थी। इतना ही नहीं कोई छोटा-सा काम भी करवाना हो तो किसी 7 रुपल्ली कमाने वाले मामूली सिपाही को भी मुझ जैसे आदमी को हवलदार साहब कहकर पुकारना पड़ता था। लेकिन इसके बाद हमें कभी ऐसा नहीं करना पडे़गा। अबके बाद सभी बातें कानूनन ही होंगी। हममें से कुछ अस्पृश्य कलक्टर बनेंगे। सैंकड़ा 20 मामलतदार, सैंकड़ा 20 कुलकर्णी, और सैंकड़ा 20 सिपाही अस्पृश्य लोगों में से ही होंगे। और ऐसा करने के लिए हमें किसी की खुशामद नहीं करनी पडे़गी। हालांकि यह सब अपने लोगों का चरित्र कैसे बनेगा, इस पर निर्भर करेगा। क्योंकि हममें से कुछ लोग दो पैसे के चनों को या एक दमड़ी के चिवडे़ (भुजिया) के मोह में अपना वोट बदलते हैं, यह हमने देखा है। जिन नेताओं ने पिछले मार्च माह में अस्पृश्यों की सभाएं लेकर और खुद अध्यक्ष बन कर अस्पृश्यों के लिए पृथक चुनाव क्षेत्र की मांग की थी, उन्होंने ही विरोधी पार्टी के दिखाए गए लालच के कारण अपनी राय बदल डाली और अस्पृश्यों के लिए संयुक्त चुनाव क्षेत्र की मांग की। इस तरह अगर नेता अपने आप को बेचने लगे तो हाथ में आई सŸा किस काम की है?