55. अस्पृश्य समाज के लिए शिक्षा के प्रसार की बेहद जरूरत है - सितंबर 1932 परेल(मुंबई) - Page 313

296 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

आगे बाबासाहेब ने वहां इकठ्ठा हुए लोगों को ठीक से समझ आए इसलिए आज की स्थिति का एक शब्दचित्र बनाया। उन्होंने कहा कि, ”इस देश की उच्च नीचता दृढ़मूल होने के लिए जातिव्यवस्था तो कारण है ही, लेकिन उसे स्थायित्व मिला तो जाति के गुणों के कारण। कुछ जातियों की वरिष्ठता अन्य जातियों में पाए गए शिक्षा के अभाव के कारण कायम रही। बड़ी-बड़ी सरकारी नौकरियां, मामलतदारी अथवा पुलिस अधिकारी जैसे लोगों के ऊपर रौबदाब रखने वाली नौकरियां या फिर लोगों पर सŸा का प्रयोग करने वाली नौकरियों के क्षेत्रों में अस्पृश्य समाज को प्रवेश की अनुमति नहीं इससे प्रत्यक्ष व्यवहार में इस समाज की उपेक्षा तो हो ही जाती है, लेकिन इस समाज की ओर देखने का अन्य समाज का दृष्टिकोण भी अलग ही होता है। इस तंग संकुचित दृष्टि को बदल कर अपने समाज के बारे में अन्य लोगों के मन में जो असमानता की भावना है, उसे अगर नष्ट करना हो तो उसका सटीक उपाय है, इन बड़ी-बड़ी नौकरियों को पाना। आज डिप्टी कलक्टर के पद पर काम कर रहे एक युवक का उदाहरण इस मामले में दिया जा सकता है। वे जिन-जिन जिलों में जाते हैं वहां के अस्पृश्य समाज को अपने सिर पर कृपाछत्र होने का अहसास तो होता ही है। साथ ही, बाकी समाज द्वारा अस्पृश्यों के साथ हेय मानने की मानसिकता भी कम हो जाती है। ऐसे अनेक अधिकारी होंगे तो आज की यह स्थिति पलटने में देर नहीं लगेगी। लेकिन एक बात हमेशा हमें ध्यान में रखनी चाहिए कि, अभी जिसका उदाहरण दिया, उस व्यक्ति ने यदि उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं की होती, तो क्या उसे यह स्थिति नसीब होती? घोर मेहनत कर अगर उन्होंने शिक्षा प्राप्त नहीं की होती तो क्या उन्हें आज का यह दिन देखने मिलता? इसीलिए कहता हूं कि एक व्यक्ति के नाते नाम कमाना और साथ में अपने समाज का नाम भी ऊंचा करना केवल शिक्षा से ही संभव हो सकता है। आज कानूनन हमने सरकारी नौकरियों में अपना अनुपात तय करवा लिया तो भी उन्हें पाने के लिए सही शिक्षा प्राप्त कर अपने में काबीलियत (योग्यता) पैदा किए बगैर हमारी अधि् ाकार प्राप्ति की मांगें, अपना असर खो बैठेंगी। इसमें दुर्बलता के कारण अपनी ही चीज हम पा नहीं सकेंगे।

गोलमेज सम्मेलन हो या कोई और जगह हो, हर बार अस्पृश्य समाज के लिए विधिमंडल में आरक्षित जगहों की मांग करते हुए मुझे हमेशा इस बडे़ सवाल ने परेशान किया है। लेकिन अस्पृश्यों की बढ़ती महत्वाकांक्षाएं और और दिनोंदिन उनमें बढ़ती जा रही शिक्षा पाने की लालसा पर मुझे पूरा भरोसा था। पिछले जमाने के साथ तुलना करने से आज अस्पृश्य साज को उपलब्ध ज्ञानार्जन के साधन तथा स्थितियों में आए फर्क के कारण उत्साह बढ़ता है।“ इतना कह कर इस अवसर पर उन्होंने अपने जीवन में घटित एक मनोरंजक लेकिन बोधप्रद अनुभव कथन किया। उन्होंने बताया