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अपने लोगों के न्यायपूर्ण अधिकारों के लिए लड़ते हुए अगर किसी ने रास्ते के लालटेन लगाने के खंभे पर फांसी चढ़ाया तो भी मुझे
उसकी परवाह नहीं
भारत के आगामी संविधान में अल्पसंख्यक समाज का स्थान क्या हो, इस विषय में निर्णय लेने के लिए विचारार्थ अल्पसंख्यक उप समिति (माइनॉरिटीज सब कमेटी) नियुक्त की गई थी।
‘‘अल्पसंख्यकों की समस्याओं के बारे में निर्णय किए जाने के सम्बन्ध में मुस्लिम, अछूत, यूरोपीय, ईसाई, एंग्लोइंडियन आदि समाजों के अल्पसंख्यक प्रतिनिधियों ने आपस में विचार-विनिमय कर आम सहमति से जो अनुबंध तैयार किया था, वह यहां दिया जा रहा है। इस अनुबंध में कुल ग्यारह मांगें रखी गई थीं और उसी अनुपात में प्रांत प्रतिनिधियों की संख्या तय की गई थी। अल्पसंख्यक वर्ग की आम मांगें
- नौकरी, व्यवसाय, या नागरिकता का अधिकार हासिल करने के मामले में किसी
भी व्यक्ति के लिए जाति, धर्म या पंथ बाधा न बने।
- किसी जाति के बारे में कानून बनाने के संदर्भ में विधान बाकायदा मंडल पर
लागू किए जाने वाले निर्बंधों, नियंत्रणों का संविधान में उल्लेख किया जाए।
- धर्म के मामले में हर किसी को पूरी आजादी हो और धर्म परिवर्तन के कारण
नागरिकता के अधिकारों से कोई वंचित न हो।
- हर जाति को अपनी जाति की धार्मिक और शिक्षा संस्थाओं के खर्चों पर नियंत्रण
रखने का तथा इस तरह की संस्थाओं को धार्मिक मामलों पर अमल करने का
अधिकार प्राप्त हो।
- धर्म, संस्कृति, व्यक्तिविषयक कानून, शिक्षा का प्रसार, भाषा का संवर्द्धन और
धर्मदाय संस्थाओं का प्रसार आदि के बारे में सभी अल्पसंख्यक जातियों को पूरी
सुरक्षा प्रदान किए जाने की व्यवस्था संविधान में की जाए और सरकार और
स्थानिक स्वराज संस्थाओं को मिलनेवाली सहायता राशि में भी उनका न्यायपूर्ण
हिस्सा हो।
- हर जाति को नागरिकता के अधिकार होना चाहिए।