16 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस धर्म के सिद्धांत इतने ऊंचे मगर जिसका व्यवहार इतना नीचतापूर्ण हो तो क्या उस धर्म में रहने से हमारी उन्नति होगी? लेकिन इस सवाल का जवाब देना कठिन है कि क्या हम लोगों को धर्मांतरण करना चाहिए? मैं इस विवादास्पद सवाल में नहीं जाना चाहता कि धर्म मनुष्य के लिए आवश्यक है या नहीं। मगर इतना सच है कि कुछ लोगों के लिए और विशेषकर हिंदुओं को धर्म प्राणों से प्रिय है लेकिन जिस धर्म में मनुष्यता न हो वह धर्म किस काम का? जो धर्म अपने अनुयायियों के भौतिक और पारलौकिक सुखों के द्वार खोलने के बजाय उन्हें बंद करके लोगों को अधःपतन की ओर ले जाए उस धर्म से चिपके रहने में क्या अर्थ है? मुझे समझ में नहीं आता कि यदि ये लोग धर्मांतरण करने के बाद ही हमें मनुष्य मान कर हमारे साथ समानता का व्यवहार करने लगेंगे तो फिर हमें धर्मांतरण क्यों नहीं करना चाहिए? वायकोम सत्याग्रह का ही उदाहरण लीजिए- जिस रास्ते पर अस्पृश्य वर्ग को जाने की मनाही है उस रास्ते पर ईसाई, मुस्लिम और अन्य गैर हिंदुओं को जाने की खुली छूट है। इस भेदभाव के बारे में पूछने पर छाती ठोंककर कहा जाता है कि चूंकि अस्पृश्य हिंदू हैं, इसलिए उनके रास्ते पर से गुजरने पर पाबंदी है। यदि यही हिंदुओं के नियम हैं तो हम आज ही धर्म का त्याग करके और धर्मांतरण करके अपनी मुक्ति क्यों न कर लें? मेरा विश्वास है कि यदि आज हम धर्मत्याग करें तो हमारे लिए इस्लाम धर्म का स्वीकार करना अच्छा रहेगा। जो हिन्दू हमारा तिरस्कार करते हैं वही हमारा सम्मान करेंगे। हम आज जिस तरह बहिष्कृत हैं, वैसे रहने के बजाय एक बड़े समाज का अंग बनकर हम थोड़े ही समय में अपनी प्रगति कर लेंगे।
देशांतर और धर्मांतर के अलावा नामांतर को अस्पृश्यता निवारण का नया उपाय बताया जाता है। हाल ही में सुझाव आया है कि अस्पृश्य अपने आदिहिंदू कहें। इसमें मतभेद केवल इस बात को लेकर है कि कौन सा नाम ज्यादा अच्छा है। यह बहुत कुछ पसंद, इच्छा, मौज का सवाल है। इसलिए यह निर्णायक रूप से नहीं कहा जा सकता कि इस मसले को वादविवाद से हल किया जा सकता है। ऐसा होने के बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि नामांतर का मुद्दा निरर्थक है। मेरी राय है कि यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि नाम में ही सारा निचोड़ है। इसके कई कारण हैं।
अस्पृश्यों में जातिभेद को लेकर जो मतभेद हैं उसमें यह मान लिया जाता है कि जातिभेद और अस्पृश्यता शाखात्मक है और इसके अनुसार रोटी-बेटी के व्यवहारों का भिन्न शाखात्मक होने के कारण लोग पालन करते हैं। यदि इस तर्क में जरा भी सच्चाई है तो कानून द्वारा रोटी-बेटी के व्यवहार की छूट दी गई तो हमें उस पर अमल की तैयारी दिखानी चाहिए। लेकिन यह निर्विवाद है कि लोग इस तरह कि तैयारी दिखाते नहीं। आपस में बेटी व्यवहार करने का कानून पास होकर तीन