304 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
और भरोसेलायक मार्ग विशेष प्रतिनिधित्व पाना ही है। प्रौढ़ मतदान का तरीका टेढ़ा तो है ही, भरोसेलायक भी नहीं। गांधीजी के ध्यान में यह बात जरूर आई होगी कि ऊपर बताई गई मतदान पद्धति उच्चवर्णियों के लिए फायदेमंद है। अछूतों के बारे में अपनी नीति हिंदुस्तान में रहते हुए ही अगर गांधीजी जाहिर करते तो बहुत अच्छा होता। दुर्भाग्य की बात यह है कि हिंदुस्तान में रहते हुए उन्होंने अछूतों को इस बात की भनक तक नहीं लगने दी कि वे विशेष प्रतिनिधित्व की उनकी मांग के खिलाफ हैं। वे यह कŸाई नहीं कह सकते कि उन्हें अस्पृश्यों की इस मांग के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। काश कि वे समय रहते अस्पृश्यों को अपना दिल
खोल कर दिखा देते। इससे उनके बड़प्पन में चार चांद लगते। गांधीजी इस सीधे रास्ते को अपनाते तो अस्पृश्य भी अपनी मांगों पर काँग्रेस की सहमति पाने के लिए जी-जान लड़ा देते।
जनता का ध्यान हम दूसरी एक और बात की तरफ आकर्षित करना चाहते हैं।
खास प्रतिनिधित्व के लिए मुस्लिम और सिक्खों की मांगों पर ही गौर करना कांग्रेस का जनादेश जैसे तय था उसी तरह इन मांगों को मानने के लिए काँग्रेस कहां तक आगे बढे़ इस बारे में भी एक सूत्र बना हुआ था। अल्पसंख्यकों की निजी समिति के अध्यक्ष और कांग्रेस के प्रतिनिधि इन दो पहलुओं वाले रिश्ते के कारण मुस्लिमों के साथ सुलह करवाने का कार्य उनको सौंपा गया था। हर दिन वे समिति के सदस्यों से कहते कि उनकी कोशिशें विफल रहीं। लेकिन असफलता के कारणों का उन्होंने कभी खुलासा नहीं किया। मुस्लिम अपने चौदह मुद्दों पर अडे़ रहे और महात्मा गांधी काँग्रेस की नीतियों से बंधे रहे और इन्हीं वजहों से सुलह होना संभव नहीं हो पाया ऐसा अन्य सदस्यों को लगा। गांधीजी ने मुस्लिमों के चौदहों मुद्दे माने और कहा कि चुनाव क्षेत्र संयुक्त हो या अलग-अलग हों इस बात का निर्णय मुसलमानों के जनमत-संग्रह के अनुसार तय किया जाए, आदि बातें अब खुल चुकी हैं। गांधी ने शर्त रखी कि काँग्रेस की सभी राजनीतिक मांगों को मुसलमान पूरी तरह मान लें तथा अन्य अल्पसंख्यकों के बारे में किसी तरह की दखलंदाजी न करें। उनकी इसी शर्त के कारण सुलह नहीं हो पाई।
मुसलमानों के साथ सुलह की बातें करते हुए गांधीजी काँग्रेस के निर्देशों में अपनी पसंद के अनुसार बदलाव करते या कभी उन निर्देशों की धज्जियां भी उड़ाते लेकिन अस्पृश्यों या अन्य अल्पसंख्यकों के साथ जब सुलह की बातें शुरु होतीं तब वे मूल निर्देश ज्यों के त्यों उनके मुंह पर दे मारते। यह तिलमिलाहट पैदा करने वाली बात थी। हालांकि हम यह नहीं कहते कि इस क्रोध को व्यक्त करने के लिए इस पत्र को आपके अखबार में जगह मिले। अस्पृश्यों को स्वतंत्र प्रतिनिधित्व मिलने के लिए चल रही हमारी कोशिशों को विफल करने के लिए गांधीजी किन-किन उपायों पर अमल