56. अपने लोगों के न्यायपूर्ण अधिकारों के लिए लड़ते हुए अगर किसी ने रास्ते के लालटेन लगाने के खंभे पर फांसी चढ़ाया तो भी मुझे उसकी परवाह नहीं - नवंबर, 1931 लंदन (खत) - Page 322

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कर रहे हैं यह सबके सामने प्रकट हो इसलिए हमारी विनती है कि इस पत्र को आप प्रकाशित करें। ऐसा करना खुद हमारे लिए भी दुःखदायी है। लेकिन अस्पृश्यों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए हमने अगर तुरंत इलाज नहीं किया तो हमें लगेगा कि अस्पृश्यों के नेता होने के नाते हम अपना कर्त्तव्य निभाने से चूक गए।

अल्पसंख्यक उप-समिति की निजी समिति का काम जारी रहे इसलिए गांधीजी ने जब उप-समिति का काम स्थगित रखे जाने का प्रस्ताव रखा तब अस्पृश्यों की ओर से हमने आपत्ति जताई। हमने जो विरोध किया था उसका कारण था। हमारे बारे में काँग्रेस की नीति का पता चलने के कारण निजी समिति में हमारे भाग लेने के बावजूद कुछ होने वाला नहीं है यह हमें पता चल चुका था और यही हमारे विरोध का कारण था। हालांकि गांधीजी ने यह भी बताया था कि अन्य अल्पसंख्यकों द्वारा अस्पृश्यों की मांगें अगर मान ली जाएं तो उन्हें मान लेने के काँग्रेस के निर्देश उनके पास थे। गांधीजी से यह आश्वासन पाने के बाद हम निजी समिति के कामकाज में हिस्सा लेने के लिए राजी हुए। समिति में गांधीजी ने काँग्रेस के निर्देशानुसार ही कदम-कदम पर हमारा विरोध किया। हालांकि, गांधीजी इस हद तक विरोध करेंगे इसका हमें बिल्कुल अंदेशा नहीं था। विश्वसनीय सूत्रों से हमें पता चला कि अस्पृश्यों के साथ गांधीजी का बर्ताव मित्रों-सा तो नहीं ही है, अफसोस ये है कि वह ईमानदार शत्रु का भी नहीं है। उन्होंने अपने मुसलमान मित्रों के आगे शर्त रखी कि आपकी चौदह मांगें अगर मनवानी हों तो अस्पृश्यों का और अन्य अल्पसंख्यकों का विरोध करो। खुलेआम यह कहना कि, अन्य अल्पसंख्यकों द्वारा अस्पृश्यों की मांगें अगर मान ली जाएं तो उन्हें मान लेने में उन्हें कोई ऐतराज नहीं, और फिर अंदर ही अंदर उनके द्वारा अस्पृश्यों की मांगें मान न ली जाएं इसके लिए उनके साथ बातचीत जारी रखना, उन्हें हर तरह के लालच दिखाना आदि शायद किसी महात्मा को ही शोभा देगा या फिर अस्पृश्यों के दुराग्रही शत्रु को। गांधीजी की नीति से हम परास्त नहीं हुए, हारे नहीं। क्योंकि, अपनी मांगें सही और न्यायसंगत होने का हमें विश्वास है। साथ ही, सप्रू, पेट्रो जैसे प्रतिनिधियों की न्यायबुद्धि पर भी हमें भरोसा है। ख्1,

प्रधानमंत्री जो निर्णय लेंगे उसे मानने के बारे में गांधीजी ने अपनी स्वीकृति दी थी। गोलमेज सम्मेलन में कोई निर्णय न होने की वजह से 1 दिसंबर, 1931 को अनिर्णय की स्थिति में सम्मेलन का समापन किया गया। इसके बावजूद अस्पृश्यों की मांगें बिल्कुल न मानी जाएं इसके लिए गांधीजी ने हिंदुस्तान के स्टेट सेक्रेटरी (सचिव) सर सैम्युअल होअर के साथ पत्र-व्यवहार किया।

  1. जनता, 14 नवंबर, 1931