4. समाज जीवन में निरपेक्ष कर्तव्य भावना से संघर्ष करना चाहिए - मई 1924 मुंबई - Page 34

17

साल गुजर गए लेकिन कहीं सुनाई देता कि इस कानून का लाभ लेने की कोशिश की गई हो। मेरी राय में इसका असली कारण यह है कि जातिभेद और अस्पृश्यता भिन्न शाखात्मक न होकर भावनात्मक हैं। इसलिए हमे यदि उसे खत्म करना है तो शाखाओं पर प्रहार न करते हुए नामों का उन्मूलन करने का अभियान चलाना चाहिए। मैंने कई बार विचार किया कि इस भावना को कैसे खत्म किया जा सकता है। सोच-विचार करने के बाद मेरी पक्की राय बनी कि अस्पृश्यता और जातिभेद यह नाम में ही समाए हुए हैं। उच्चवर्णीय हमारा तिरस्कार करते हैं तो केवल हमारे नाम के कारण। महार कहने पर सुनने वाले के मन में एक तरह से तिरस्कार की भावना पैदा होती है। मराठा कहने पर अलग भावना उत्पन्न होती है, ब्राह्मण कहने पर सुनने वाले के मन में आदर की भावना जागती है। कोई इन बातों को गलत नहीं कह सकता। इस मामले में धेड जाति का उदाहरण दिया जा सकता है। यह बताने की जरूरत नहीं है कि गुजरात के धेड जाति के लोगों को अस्पृश्यता कितनी तीव्रता से झेलनी पडती है फिर भी बंबई आने पर वे दक्षिणी मराठा के पड़ोस में रहते हैं। इतना ही नहीं तो मैंने उनमें रोटी का व्यवहार चलते हुए देखा है।

यही सभी जानते हैं कि दूसरी तरफ अगर महाराष्ट्र का कोई अस्पृश्य गुजरात जाता है तो दक्षिणी कहकर वह ब्राह्मणों के भोजनालय में रह सकता है। हाल ही के दो-तीन वर्षों में पूरा मद्रास पेट भरने के लिए बंबई आ गया है और उसमें मद्रास के बहुत सारे अस्पृश्य लोग भी हैं। लेकिन ये मद्रास के अस्पृश्य मुंबई के हिंदु विश्रांतिगृहों, धर्मशाला में आराम से खाते-पीते हैं। उन पर कोई पाबंदी नहीं है। एक क्षेत्र का अस्पृश्य दूसरे क्षेत्र में जाने पर स्पृश्य बन जाता है। इस अजीब बात की वजह खोजने पर यह दिखाई देता है कि सभी क्षेत्रों में अस्पृश्यता के चिह्न और लक्षण एक जैसे नहीं हैं। एक जगह के लक्षण दूसरे क्षेत्र को पता नहीं हैं। लक्षणों, चिह्नों के अभाव में एक प्रांत का अस्पृश्य दूसरे प्रांत में स्पृश्य माना जाता है। मनुष्य या जाति के तौर पर वह अस्पृश्य नहीं है। समाज में यह एक परंपरा है कि एक खास तरह का नाम धारण करने वाले लोग अस्पृश्य माने जाते हैं। जिनके पास यह नाम नहीं है उन्हें स्पृश्य माना जाता है। वैसे अस्पृश्य आदमी की शारीरिक संरचना, चमड़ी, रूपरंग में स्पृश्य आदमी की तुलना में ऐसा अलग कुछ भी नहीं है कि पहली बार देखने पर जिस तरह सिद्दी लोगों को युरोपियनों से या इन दोनों को चीनी और जापानियों से अलग किया जाता है उसी तरह अस्पृश्यों को स्पृश्यों से अलग किया जा सके। नाम के अलावा अस्पृश्यता की पहचान का और कोई चिह्न नहीं है। इसलिए, मेरी राय में नामांतरण करना उचित है।

यहां तक नामांतरण का समर्थन करने वालों के साथ मेरी राय मिलती है। मगर मेरी समझ में नहीं आता कि मुंबई क्षेत्र के अस्पृश्य वर्ग को आदि-हिंदू कहला कर