56. अपने लोगों के न्यायपूर्ण अधिकारों के लिए लड़ते हुए अगर किसी ने रास्ते के लालटेन लगाने के खंभे पर फांसी चढ़ाया तो भी मुझे उसकी परवाह नहीं - नवंबर, 1931 लंदन (खत) - Page 333

316 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

की जा सके तो सचमुच हमें बड़ी खुशी होगी। हालांकि पिछले अनुभवों के आधार से अगर देखा जाए तो इस बारे में किसी भी तरह की बातचीत या सुलह नहीं हो पाती। इसीलिए, भारतीय नेता अगर नई योजना तैयार करने के लिए बातचीत शुरू करते हैं तो सरकार उसमें शामिल नहीं हो सकेगी। लेकिन भारतीय अगर जाति से संबंधित विवादों को भुला कर सर्वसहमति से कोई निर्णय लेते हैं और कोई योजना प्रस्तुत करते हैं तो हमारी योजना को वापिस लेने और उस नई योजना का स्वीकार करने के लिए सरकार बड़ी खुशी से तैयार होगी। अगर कोई प्रांत सर्वसहमति से कोई योजना तैयार कर लेता है तो उस प्रांत के लिए हमारी योजना को रद्द करते हुए नई योजना को स्वीकृति दी जाएगी।

सरकार के आज के इस निर्णय की अच्छाई-बुराई की पड़ताल करने से पहले किन परिस्थितियों में सरकार को यह निर्णय लेना पड़ा उस पर विचार किया जाना जरूरी है। अल्पसंख्यक समाज को अपने हितों की रक्षा के लिए लंबे समय से स्वतंत्र चुनाव क्षेत्र की जरूरत महसूस हो रही है। इस बात पर भी ध्यान दिया जाना जरूरी है। इसलिए अब तक जो कानूनी और विकासोन्मुख योजनाएं बनीं उनमें से हर एक में स्वतंत्र चुनाव क्षेत्र की योजना की गई है। सब में एक-सा चुनाव क्षेत्र हो ऐसी सरकार की इच्छा भले हो, लेकिन अल्पसंख्यक समाज को स्वतंत्र चुनाव क्षेत्र की तथा अन्य संरक्षण बंधनों की तीव्र आवश्यकता महसूस हो रही है। सरकार इस बात को नजरंदाज नहीं कर सकती। अल्पसंख्यकों को पहले इसकी आवश्यकता क्यों महसूस हुई इस बारे में चर्चा करने से कुछ हासिल नहीं होगा। मैं मानता हूं कि भूत से अधिक भविष्य की चिंता करना बेहतर होता है। मैं उस भविष्य के इंतजार में हूं जिसमें हिंदुस्तान की छोटी-बड़ी सभी जनजातियां एक होकर विश्वास के साथ काम करेंगी तथा सुरक्षा बंधनों की किसी को भी जरूरत महसूस नहीं होगी। लेकिन फिलहाल जो स्थितियां हैं उन्हें ध्यान में रखते हुए इस तरह की अपवादस्वरूप योजना प्रस्तुत करने के अलावा सरकार के सामने कोई चारा नहीं था।

इस निर्णय को ध्यान में रखते हुए मुझे लगता है कि उसमें दिए गए दो प्रमुख सवालों का उल्लेख करना जरूरी है। उनमें से एक मुद्दा अस्पृश्य समाज तथा दूसरा महिला वर्ग से संबंधित है। ऐसी कोई भी योजना सरकार मंजूर नहीं होगी जिसमें इन दो वर्गों के बारे में खास व्यवस्था नहीं की गई हो। अस्पृश्यों के बारे में सोचते हुए हमने दो प्रमुख मुद्दों की ओर ध्यान दिलाया है। पहला मुद्दा है -बड़ी संख्या में अस्पृश्यों की बस्ती होने वाले प्रांत में या उस क्षेत्र में उनके विश्वासपात्र या उनकी पसंद के प्रतिनिधियों को चुनने का मौका अस्पृश्य समाज को देना और दूसरा मुद्दा यह कि - पहले मुद्दे में उल्लेखित मौके उपलब्ध कराते हुए अब तक वे जिस तरह समाज से बाहर रहे वैसा न होने पाए ऐसी चुनाव पद्धति उन्हें देनी है इस तरफ ध्यान