56. अपने लोगों के न्यायपूर्ण अधिकारों के लिए लड़ते हुए अगर किसी ने रास्ते के लालटेन लगाने के खंभे पर फांसी चढ़ाया तो भी मुझे उसकी परवाह नहीं - नवंबर, 1931 लंदन (खत) - Page 337

320 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व के बारे में ब्रिटिश सरकार ने जो निर्णय दिया है, वह मैंने पढ़ा और उस पर विचार करना टाल दिया। सर होअर को जो खत मैंने लिखा और दिनांक 13 नवंबर, 1931 के दिन सेंट जेम्स राजमहल में गोलमेज सम्मेलन की अल्पसंख्यक लोगों की बैठक में, मैंने जिस नीति की घोषणा की थी, उसके अनुसार मुझे आपके इस निर्णय का प्राणांत तक विरोध करना होगा। और ऐसा करने का एक ही मार्ग है और वह है प्रायोपवेशन से अन्न ग्रहण ना कर उपवास करना। नमक या सोडा खाकर अथवा न खाते हुए केवल जलप्राशन करते हुए अनशन करना और मृत्यु को अपनाने के अपने निर्णय की मैं घोषणा कर रहा हूं। प्रायोपवेशन के दौरान ब्रिटिश सरकार ने अगर खुद होकर या लोगों के दबाव में आकर अपने निर्णय के बारे में फिर से विचार किया और अपनी जातिनुसार अलग चुनाव क्षेत्र की योजना का प्रस्ताव वापिस लिया तो मेरा अनशन रुकेगा। अस्पृश्यों के प्रतिनिधि सार्वजनिक चुनाव क्षेत्रों से चुन कर आएं और सबको समान अधिकार हों। भले उनका क्षेत्र चाहे जितना व्यापक क्यों न हो। जातियों से संबंधित निर्णय अगर इस तरह से बदला नहीं गया तो सामान्य स्थितियों में दिनांक 20 सितंबर की दोपहर से मेरा आमरण अनशन शुरू होगा।

यहाँ के अफसरों से मैं कह रहा हूं कि मेरा यह पत्र आप तक तार द्वारा भेजा जाए, ताकि आपको काफी पहले ही सूचना मिल जाए। डाक द्वारा धीमी गति से भी यदि यह खत आप तक पहुंचेगा तब भी मैं आपको काफी समय दे रहा हूं। मेरा यह कहना है कि यह खत तथा सर होअर को लिखा मेरा पत्र जितनी जल्दी संभव हो प्रकाशित करें। जेल के नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करते हुए मैंने इन दोनों

खतों की जानकारी सरदार वल्लभ भाई पटेल और श्री महादेव देसाई के अलावा और किसी को नहीं दी है। हालांकि यदि आप फुर्सत दें तो मेरी इच्छा है कि उन

खतों का जनता पर परिणाम हो और इसीलिए उन खतों को प्रकाशित करने की मांग मैंने की है।

अपने आमरण अनशन के निर्णय के बारे में मुझे दुख है। किंतु एक धार्मिक व्यक्ति इस दृष्टि से भी, और मैं धार्मिक हूं ऐसा मैं समझता हूं, इससे अलग कोई राह बची नहीं है। सर होअर को लिखे खत में मैंने कहा ही है कि, सरकार अगर अपने ऊपर आने वाले दबाव के कारण मुझे बंधनमुक्त करे तो, या अब मुझे जेल से छोड़ भी दिया जाए, तो मैं अपने अन्नत्याग की कसम को तोड़ नहीं सकता। मेरा प्रायोपवेशन जारी रहेगा। क्योंकि इस जाति के बारे में लिए गए इस निर्णय का विरोध अन्य किसी मार्ग से नहीं किया जा सकता, ऐसा मुझे लगता है। और, मैं केवल सम्मानजनक ढंग से ही अपनी मुक्तता चाहता हूं। अन्य किसी तरह से करवाने की मेरी बिल्कुल भी इच्छा नहीं है।

हो सकता है कि अस्पृश्यों को अलग चुनाव क्षेत्र देना, उनके और हिंदू धर्म के लिए घातक है, यह मेरी सोच गलत हो और मेरा मत विकृत हो। अगर यही