56. अपने लोगों के न्यायपूर्ण अधिकारों के लिए लड़ते हुए अगर किसी ने रास्ते के लालटेन लगाने के खंभे पर फांसी चढ़ाया तो भी मुझे उसकी परवाह नहीं - नवंबर, 1931 लंदन (खत) - Page 338

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वास्तविक स्थिति हो तो इससे यही साबित होगा कि मेरे जीवन का बाकी दर्शन भी गलत है। अगर यह बात सही हो, तो अन्नत्याग से प्राणत्याग करना मेरी गलती का प्रायश्चिŸा होगा। इसके साथ ही जो असंख्य स्त्री-पुरुष आज बच्चों की तरह मेरे बुद्धिचातुर्य पर विश्वास करते हैं उनके ऊपर का बोझ भी कम होगा। लेकिन अगर मेरा मत सही होगा, और उसके सही होने के बारे में मुझे रŸाभर भी दुविधा नहीं है, तो भी जो करने की मैंने ठानी है वह मेरे जीवन को सार्थक करने वाला ही सिद्ध होगा। चौथाई शतक से अधिक समय तक मैं इसी जीवनमार्ग से चल कर आया हूं और ऐसा भी नहीं कि मुझे इसमें भरपूर यश न मिला हो।

आपका विश्वासपात्र मित्र,

(हस्ताक्षर)

एम के गांधी ख्1,

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10, डौनिंग स्ट्रीट

दिनांक 8 सितम्बर, 1932

प्रिय मि. गांधी,

आपका पत्र मिला। मुझे बडा विस्मय और खेद हुआ। साथ में यह भी लगा कि सरकारी निर्णय में अस्पृश्यों के बारे में क्या अर्थ निकला कि जिससे आपको गलतफहमी हुई और आपने वह खत लिखा। हिंदू समाज से अस्पृश्यों को हमेशा के लिए अलग करने के लिए शुरु से आप कड़ा विरोध करते आए हैं, यह हमें पता है। आपने अपना मत अल्पसंख्यक मंडल के आगे तथा 11 मार्च को सर होअर सॅम्युअल को लिखे खत में साफ तौर पर लिखा ही है। आपके मन को हिंदू समाज के बडे वर्ग का अनुमोदन है, यह भी हम जानते हैं। इसीलिए अस्पृश्यों को हक देने के मसले पर सोचते हुए हमने आपके मत पर गहराई से सोचा।

अस्पृश्यों की संस्थाओं से जो अनगिनत अर्जियां हमारे पास आई हैं, और उनकी राहों में जो दिक्कतें हैं जिन्हें मानने से आपको भी ऐतराज नहीं, उन सब के बारे में हमने सोचा, और हमें लगा कि विधिमंडल में योग्य अनुपात में प्रतिनिधित्व पाना अस्पृश्यों का अधिकार है और उनके उस हक की रक्षा करना हमारा कर्त्तव्य है। साथ ही, हम इस बात का भी खयाल रख रहे थे कि किसी तरह अस्पृश्य समाज हिंदुओं

  1. डॉ. भी. रा. अम्बेडकर चरित्र : चां. भ. खैरमोडे, खंड 5, पृ. 22-23