18 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
क्या हासिल होगा? यदि इसका उद्देश्य अस्पृश्य वर्ग की सभी जातियों का एकीकरण है तो बहिष्कृत नाम में क्या बुराई है? मुझे संदेह है कि इससे अच्छा दूसरा अर्थपूर्ण उपनाम दिया जा सकता है। यदि नई नीति का उद्देश्य यह है कि आदि नाम लगाने से अस्पृश्यता चली जाएगी तो यह केवल भ्रम है। कई बार महार लोग शर्म के कारण किसी के पूछने पर बताते हैं कि मैं चोखा हूं। उसी तरह चमार, मैं रोहिदास हूं, कहते हैं, मगर वे एक नाम के कारण जितने अस्पृश्य हैं उतने ही दूसरे नाम के कारण भी अस्पृश्य हैं। मद्रास में अस्पृश्य वर्ग अपने को आदि द्रविड़ कहता है लेकिन इस कारण उनकी अस्पृश्यता जाने का कोई प्रमाण नहीं है। यह पूरी तरह से सही है कि अस्पृश्यता और जातिभेद नाम में ही समाए हुए हैं और ये नाम खत्म किए बगैर चलेगा नहीं। केवल जातिवाचक नाम हम छोड़ दें तो उससे कुछ नहीं होगा। हमारे साथ सभी जाति के लोगों को अपने जातिवाचक नाम छोड़कर सभी को एक ही सर्वसाधारण नाम को अपनाना चाहिए। मेरी राय में सभी को स्वयं को केवल हिन्दू ही कहना चाहिए और जातिसूचक उपनाम निकाल देने चाहिए। कोई अपने आपको ब्राह्मण, मराठा, चमार, महार, मांग आदि न कहकर केवल हिन्दू कहे। इससे समाज में समता पैदा होने से एकता पैदा होगी। हिन्दू कहने से कोई किसी का तिरस्कार नहीं करेगा। कोई किसी को नीचा और कोई किसी को श्रेष्ठ नहीं मानेगा। इसके अलावा लोगों का एक दूसरे के प्रति सहानुभूति जाति पर आधारित नहीं होगी और समाज से अन्याय, अनेकता, संवेदनहीनता खत्म हो जाएंगी। आज मराठा होने पर ही अन्य मराठे उससे सहानुभूति दिखाते हैं। इसी तरह ब्राह्मण ब्राह्मण के अलावा किसी और के प्रति सहानुभूति दिखाने को तैयार नहीं होता। लेकिन जहां सभी हिन्दू होंगे वहां सहानुभूति में कोई बाधा ही नहीं होगी। मुस्लिम समाज में दिखाई देने वाली एकता की वजह क्या है, यही है। उनमें मुसलमान होना काफी है। वह अपना हो गया। मेरा ऐसा मानना है कि ऐसा हिन्दुओं में भी होने के लिए समान नाम होना चाहिए और वह हिन्दू हो।
जब यह परिवर्तन होगा वह शुभ दिन होगा। लेकिन महत्वपूर्ण सवाल यह है कि परिवर्तन लाने के लिए क्या किया जाए।
कई मामलों में तो सरकारी कानून बनाए बगैर सामाजिक अन्याय का निर्मूलन होना असंभव है। इस कारण सामाजिक और धार्मिक मामलों में जहां कानून बनाकर सुधार करने के बारे में भ्रम की स्थिति है उनके बारे में अंग्रेज सरकार ने माना है कि जाति और रूढि़यों के बारे में कानून शिकंजा कसा जाना हमें मंजूर नहीं है। मैं मानता हूं इस दृष्टि से बहुत खुशी की बात यह है कि हिन्दुस्तान को स्वराज मिलने का अवसर आया है। क्योंकि ब्रिटिश कानून हुकूमत हमारे लिए हो तो बाधा और न हो तो अराजकता की तरह है। हमारे लोगों को स्वराज से बहुत डर लगता