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की आहुति जैसे भयंकर दिव्य तक करने के लिए आप तैयार हो गए हैं। आपका यह प्रायोपवेशन अस्पृश्यों को संयुक्त चुनाव क्षेत्र मिले इसलिए है, ऐसा मुझे नहीं लगता। क्योंकि वह तो उन्हें दे दिया गया है। हिंदू समाज में एकता रहे, इसके लिए अगर आपका यह प्रायोपवेशन है, ऐसा आप कहेंगे तो वह भी मैं आपका झूठ ही कहूंगा। क्योंकि सरकारी योजना में उसका भी प्रबंध किया गया है। इन सभी बातों पर गौर करते हुए मुझे ऐसा लगता है कि वास्तविक स्थिति पर ध्यान न देते हुए आपने यह निर्णय लिया है। जाति के बारे में निर्णय पर सोचे बगैर जब सब लोगों ने हमसे अनुरोध किया तभी हमने अल्पसंख्यकों के सवाल पर ध्यान देने का निर्णय लिया। अब उस निर्णय में एक शर्त के साथ ही फेरबदल संभव है और वह शर्त है कि अगर सभी जातियां मिल कर कोई योजना बनाएं, तो सरकार उसे मान्यता देगी।
आप चाहते हैं कि सर सैम्युअल होअर को भेजे पत्र के साथ आपका सभी पत्राचार प्रकाशित किया जाए। इसके लिए मेरी भी सहमति है। आखिर में मैं आपसे सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूं कि सरकारी निर्णय पर एक बार फिर आप पूर्ण रूप से गौर करें और निर्णय करें कि आप जो भयंकर दिव्य करने जा रहे हैं उसका क्या औचित्य है।
आपका,
(हस्ताक्षर)
जे. रैम्से मैकडोनल्ड ख्1,
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मि. रैम्से मैकडोनल्ड के उपर्युक्त पत्र के उŸार में म. गांधी ने दिनांक 9 सितंबर, 1932 के दिन येरवडा जेल से जो खत भेजा उसका आशय इस प्रकार था -
प्रिय मित्र,
आपने स्पष्टतापूर्ण, विस्तृत पत्र भेजा उसके लिए मैं आपका अत्यंत आभारी हूं। हालांकि दुख भी है कि आपने पत्र से वह मतलब निकाला है, जो मेरे मन में भी नहीं था। पिछडे़ वर्गों के हितों की मैं बलि चढ़ाने जा रहा हूं, ऐसा जो आरोप आपने मुझ पर लगाया है, उसका जवाब वह दिव्य है जो मैं करने जा रहा हूं। इस तरह का निश्चय मुझे न्यायपूर्ण लगता है। अस्पृश्यों को दो बार मतदान का अधिकार देने से हिंदू समाज में पड़ने वाली फूट को टाला नहीं जा सकता। अस्पृश्यों को पृथक चुनाव क्षेत्र देने से उनका भला तो नहीं होगा, लेकिन उससे हिंदू समाज में विष के बीज बोए गए हैं। मैं बस इतना ही कहना चाहता हूं कि लोगों की आस्था के और धर्म के मसलों का हल आप सही ढंग से निकाल ही नहीं सकते।
- डॉ. बी. आर. अम्बेडकर चरित्रा : चां. भ. खैरमोडे, खण्ड 5, पृ. 23-25