324 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अस्पृश्यों को जरूरत से अधिक प्रतिनिधित्व देने के खिलाफ मैं नहीं हूं। जो बात मुझे कांटे की तरह चुभ रही है, वह यह कि अस्पृश्यों को हिंदू समाज से कायदे-कानून बना कर अलग किया जा रहा है। इस सरकारी योजना के कारण जिन महापुरुषों ने आज तक अस्पृश्योद्धार का आंदोलन बिना किसी स्वार्थ के शुरू किया, उनकी कोशिशें धरी रह जाएंगी। इसी कारण प्रयोपवेशन का दिव्य करने के लिए मैं तैयार हुआ। अपने व्रत के लिए मैंने केवल अस्पृश्यों के सवाल ही चुने हैं। इसका मतलब यह नहीं कि आपके निर्णय की बाकी बातें मुझे मंजूर हैं। मेरे मतानुसार इस निर्णय की अन्य बातें भी उतनी ही दोषपूर्ण एवं ऐतराज करने योग्य हैं।
आपका स्नेहाकांक्षी
(हस्ताक्षर)
एम के गांधी ख्1,
अखबारों के संवाददाताओं ने जब डॉ. अम्बेडकर से पूछा कि गांधीजी ने आत्महत्या की प्रतिज्ञा की है उसके बारे में आपको क्या लगता है, तब उन्होंने कहा,
”गांधीजी ने, ‘अन्नत्याग कर मैं आत्महत्या करूंगा’, कह कर जो धमकी दी है वह कोई सीधा-सादा या ईमानदार युद्ध नहीं है, वह राजनीति की पैंतरेबाजी है। अपने प्रतिस्पर्धियों को मनवाने का यह सीधा मार्ग या ईमानदार कोशिश नहीं है। इसीलिए गांधीजी के इस डराने-धमकाने वाले बयान का मेरे लिए कोई महत्व नहीं। इसीलिए उनकी इस घोषणा से मेरा मत उनके अनुकूल भी नहीं बन सकता।
मेरा निर्णय पक्का है। हिंदुओं के स्वार्थ के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा कर अगर उन्हें अस्पृश्यों के खिलाफ संग्राम छेड़ना ही हो तो अस्पृश्य समाज को भी अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए तथा अपनी सुरक्षा के लिए अपने प्राणों की बलि देने के लिए तैयार होना पडे़गा।
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गांधीजी अपनी बात साफ तौर पर कहें
यह पूछने पर कि, गांधीजी के प्रण के बारे में आप क्या कुछ भी नहीं करेंगे?, डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि, गांधीजी ने जो पत्राचार प्रसिद्ध किया है, उससे किस बात के लिए उन्होंने अपने प्राणों को दांव पर लगाया है, इसका खुलासा नहीं होता है। अस्पृश्यों से वे किस बात की अपेक्षा कर रहे हैं, हिंदुओं की तरफ से अस्पृश्यों को कौन से अधिकार देने के लिए वे तैयार हैं, तथा उनके इस तरह सुलह के लिए क्या हिंदू समाज तैयार है, जिसके लिए उन्होंने अपने प्राणों को दांव पर लगाया है
- तत्रैव : पृ. 25-26