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इस बारे में साफ-साफ और भरोसेलायक खुलासा जब तक नहीं होता, तब तक मैं भी इस मामले में निश्चित रूप से कुछ कह नहीं पाऊंगा। ख्1,
15 सितंबर, 1932 को गांधीजी ने मुंबई सरकार को खत लिखकर अपने आमरण अनशन की भूमिका स्पष्ट की। 21 सितंबर, 1932 को वह खत अखबारों में प्रकाशित करने के लिए दिया गया। इस खत में गांधीजी ने स्पष्ट किया है कि, मेरा अनशन अस्पृश्यों के राजनीतिक हकों के लिए ही है तथा अस्पृश्यों के जीने-मरने का सवाल पूर्ण रूप से धार्मिक होने के नाते मैंने इस प्रश्न पर अपना ध्यान केंद्रित किया है और इस समस्या का हल पाना मेरा परम कर्त्तव्य - पवित्र कर्म होने के नाते मैं यह अनशन कर रहा हूं।
‘ My fast has a narrow application. The depressed classes’ question being predominently religious matter, I regard it as specially my own by reason of lifelong concentration on it. It is a sacred personal trust which I may not shirk. ’ [2]
गांधी जी के आमरण अनशन के खिलाफ अपनी भूमिका को स्पष्ट करने वाला परिपत्र डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने प्रकाशित किया।
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सभी पक्षों के नेताओं की परिषद के दिन यानी सोमवार दिनांक 19 सितंबर, 1932 के दिन बाबासाहेब अम्बेडकर ने महात्मा गांधी के आमरण अनशन के बहाने अपनी योग्य भूमिका को विस्तार से समझाते हुए तथा महात्मा गांधीजी का अनशन किस तरह अस्पृश्यों के अधिकार और हित के खिलाफ है यह स्पष्ट करते हुए एक सार्वजनिक बयान जारी किया। अंग्रेजी में लिखे उस बयान का हिंदी अनुवाद यहां दिया जा रहा है -
”अंग्रेज सरकार ने अपनी खुशी से या जनमत के दबाव में आकर कोई और चारा न होने के कारण अस्पृश्य समाज को जो पृथक चुनाव क्षेत्र का जो अधिकार दिया है, उसे यदि सार्वजनिक रूप से रद्द न किया, तो मैं आमरण अनशन कर अपने प्राण त्याग दूंगा“, यह महात्मा गांधी की प्रतिज्ञा सुन कर मैं हैरान रह गया। अपनी आत्महत्या की प्रतिज्ञा से महात्मा गांधी ने मुझे कैसी कठिन और विपरीत स्थितियों में ला खड़ा किया है तथा मुझ पर कितनी बड़ी संकटपूर्ण जिम्मेदारी का बोझ लाद दिया है, यह हर कोई आसानी से समझ सकता है।
जनता : 17 सितंबर, 1932
डॉ. भी. रा. अम्बेडकर चरित्र : चां. भ. खैरमोडे, खंड 5, पृ. 26