326 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जाति से संबंधित निर्णय का सवाल अन्य सवालों की तुलना में बड़ा मामूली होने की बात खुद गांधीजी ही गोलमेज सम्मेलन में कर रहे थे। फिर, जो बात उनके मत में मामूली थी उसके लिए उन्होंने इतना बड़ा ‘प्राणत्याग का’ निर्णय क्यों लिया गया, यह मेरी समझ से परे है! उनके जैसे व्यक्ति की नजर में जाति से संबंधित मसले हिंदुस्तान के संविधान की किताब के साथ जोडे़ जाने वाले परिशिष्ट की तरह माने जाने चाहिए। जातियों से संबंधित मसले उस पुस्तक का प्रमुख या महत्वपूर्ण हिस्सा नहीं माना जाता। हिंदुस्तान को पूरी राजनीतिक आजादी मिलनी चाहिए इस मसले पर गांधीजी ने गोलमेज सम्मेलन में बहुत जोर दिया था। इस बात के लिए वे कितने आग्रही बन गए थे। इस तरह राजनीतिक आजादी जैसे महत्वपूर्ण और बड़े मुद्दे पर अगर गांधीजी अपने प्राणों की बाजी लगाते तो शायद वह ठीक भी लगता। लेकिन राजनीतिक आजादी जैसे उनकी नजर में भी महत्वपूर्ण होने वाले मसले छोड़ कर अस्पृश्यों के मतदान का एक साधारण प्रश्न चुनकर उसे वे उछाल देते हैं और उसका बहाना बना कर, अपने प्राणों की बाजी लगाते हैं यह सिरदर्द पैदा करने वाले आश्चर्य का एक खेदजनक, परेशानीमूलक तथा क्षोभकारी नमूना है। पृथक चुनाव क्षेत्र केवल अस्पृश्यों को ही नहीं मिला है, भारतीय ईसाई, एंग्लो इंडियन, मुस्लिम, सिक्खों को भी पृथक चुनाव क्षेत्र मिले हैं। इतना ही नहीं तो जमींदार वर्ग, मजदूर वर्ग और व्यापारी वर्ग के लिए भी खास या पृथक चुनाव क्षेत्र की योजना बनाई गई है। शुरुआत में मुसलमान और सिक्खों के अलावा अन्य सभी के पृथक चुनाव क्षेत्र पर गांधीजी ने आपिŸा की थी और विरोध किया था। अब केवल मुसलिम या सिक्खों को ही नहीं बल्कि अस्पृश्यों के साथ-साथ जमींदार, व्यापारी, एंग्लो इंडियन, ईसाई आदि वर्गों के लिए भी अलग चुनाव क्षेत्र दिए गए हैं। अगर विरोध करना ही था तो गांधीजी इन सभी वर्गों के अलग चुनाव क्षेत्रों को विरोध करते। लेकिन गांधीजी ने उन सभी को छोड़ कर केवल अस्पृश्य समाज को मिली सहूलियतों का बहाना करते हुए उस योजना के विरोध में अपने प्राणों की बाजी लगाने का संकल्प किया।
अस्पृश्य समाज को कुछ समय तक पृथक चुनाव क्षेत्र देने से बड़ा अनर्थ होगा, यह गांधीजी की भयावह धारणा पूरी तरह काल्पनिक है। मुस्लिम और सिक्खों को पृथक चुनाव क्षेत्र देने से राष्ट्र के टुकडे़ होंगे, ऐसा अगर गांधीजी को नहीं लगता और वे उस बात के लिए राजी होते हैं, तो फिर अस्पृश्यों को पृथक चुनाव क्षेत्र मिलने से हिंदू समाज टुकड़ों में बंट जाएगा, कहते हुए उसके विरोध में आमरण अनशन पर बैठना गांधीजी को कैसे तर्कपूर्ण और न्यायपूर्ण लगता है? अस्पृश्य वर्ग के अलावा किसी अन्य वर्गं को पृथक चुनाव क्षेत्र मिलने से अगर गांधीजी की विवेकबुद्धि विरोध नहीं करती है, किन्तु अकेले अस्पृश्यों को अलग चुनाव क्षेत्र मिलने से उनका विवेक क्यों जाग जाता है? और अपने प्राणों तक की बाजी लगा कर उसके खिलाफ दंड ठोंक कर खड़ा क्यों होता है? इस अनोखी न्यायप्रियता को क्या कहें?