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प्राप्त होने जा रहे स्वराज्य में बहुसंख्यक वर्ग के अत्याचारों से अल्पसंख्यक वर्ग की रक्षा के लिए यदि किसी वर्ग को सबसे पहले और सबसे अधिक राजनीतिक रियायतों की खास जरूरत है तो वह अस्पृश्य वर्ग ही है। सोचने-समझने वाले व्यक्ति को अब तक यह बात समझ में आ चुकी होगी, ऐसा मुझे लगता है। अस्पृश्य समाज ही एक ऐसा वर्ग है, जिसके पास आसपास चल रहे भीषण जीवनकलह में टिके रहने की बिल्कुल ऊर्जा नहीं है। जिस धर्म का उसने आश्रय लिया और जिस धर्म के बंधनों ने उसे जकड़ रखा है, उसी धर्म ने आज उसे सम्मानित जीवन देने की जगह कोढ़ी का घिनौना जीवन जीने के लिए विवश किया है। धर्म ने उसकी इन्सानियत को कलंकित कर दिया है, रौंद डाला है। रोजमर्रा के सीधे-सादे व्यवहारों में भी सम्मानपूर्वक हिस्सा लेने की योग्यता इस धर्म ने अस्पृश्य लोगों में नहीं बचने दी है। आर्थिक दृष्टिकोण से भी अस्पृश्य वर्ग पूरी तरह परावलंबी है। रोज की रोटी के लिए भी उसे उच्चवर्णीय हिंदुओं पर निर्भर रहना पड़ता है। स्वाभिमानपूर्वक और आजादी के साथ जीने का या अपना पेट पालने का कोई मार्ग अस्पृश्यों के लिए खुला नहीं है। इस गुलामी से मुक्त होने का मौका उसे कभी न मिले इसके लिए स्वावलंबन की और आत्मोन्नति की उसकी सभी राहें रोकने की खास कोशिशें जानबूझ कर की जा रही हैं। स्पृश्य हिंदुओं में आपस में कितने भी जातिभेद हों, अस्पृश्यों की छोटी से छोटी कोशिश को भी दबाने के लिए, उन पर कई तरह के जोर-जुल्म करने के लिए सभी हिंदु निर्ममता से एक हो जाते हैं यह हर गांव का प्रत्यक्ष अनुभव है कहा जाए तो अत्युक्ति नहीं होगी।
ऐसी स्थितियों में सभी सोचने-विचारने वाले और न्यायी लोगों को कोशिश करनी चाहिए कि इन सभी तरह से मजबूर और स्पृश्य हिंदुओं के जुल्मों से पीडि़त अस्पृश्य समाज को आत्मरक्षा के लिए तथा इस तीव्र जीवनकलह में टिके रहने के लिए राजनीतिक सŸा का थोड़ा हिस्सा मिलना ही चाहिए।
मुझे उम्मीद थी कि अस्पृश्य समाज का कोई भी सच्चा हितचिंतक उस समाज को राजनीतिक सŸा का ज्यादा से ज्यादा हिस्सा मिले, इसके लिए जी-जान जुटा कर कोशिश करेगा। लेकिन गांधीजी के विचारों की गंगा अजीब और उल्टी दिशा में बहती हुई दिखाई दे रही है। इसीलिए मैं उनके इन विचित्र विचारों को समझ ही नहीं पा रहा हूं। अस्पृश्य समाज के हाथों में राजनीतिक सŸा के देने के लिए गांधीजी बिल्कुल कोशिश नहीं कर रहे हैं, उल्टे अंग्रेज सरकार की जाति से संबंधित नीतियों के कारण जो थोड़ा बहुत राजनीतिक हिस्सेदारी का लाभ अस्पृश्यों को मिलने वाला है वह भी अस्पृश्यों के हाथों से छीन लेने का तथा अस्पृश्य समाज को किसी तरह की राजनीतिक हिस्सेदारी प्राप्त न हो, राजनीतिक दृष्टि से उनका अस्तित्व नजरों से ओझल ही रहे इसके लिए गांधीजी की सारी कोशिशें चल रही