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अंग्रेज सरकार की ओर से प्रधानमंत्री रैम्से मैकडोनल्ड ने जो निर्णय किया है तथा अस्पृश्यों के बारे मेंं उसमें जो योजना दी है, वह हिंदुओं को संतुष्ट रखने के योग्य है ऐसा मुझे लगता है। इतना ही नहीं, अस्पृश्य समाज के लिए अलग चुनाव क्षेत्र की मांग करने वाले राजा, गवई, पी. बालु जैसे लोग हैं, वे भी इस निर्णय में ख्ोट ढूंढते न फिरे। ऐसी स्थिति में रावबहादुर राजा ने एसेंब्ली के अपने भाषण में इस सरकारी निर्णय के बारे में जो हल्ला मचाया तथा जो शिकायतें कीं वह भी देखने-सुनने लायक तमाशा था! कल परसों तक जो अलग चुनाव क्षेत्र के उपासक थे, उच्च वर्णिय हिंदुओं के जातिभेदमूलक जुल्मों के कट्टर दुश्मन थे उन रायबहादुर के हृदय में संयुक्त चुनाव क्षेत्र के बारे में तथा उच्चवर्णिय हिंदुओं के बारे में नया-नया पैदा हुआ यह असीम प्रेम देख कर हर किसी का मनोरंजन होगा। रायबहादुर राजा के मन में उपजे इस आकस्मिक प्रेम की जड़ों में गोलमेज सम्मेलन में स्थान न मिलने की वजह से गंवाए नाम को फिर से कमाने की लालसा कितनी है, तथा उनके इस नए प्रेम में ईमानदार हृदय परिवर्तन का कितना हिस्सा है, यह जांचने के पचडे़ में मैं अभी पड़ना नहीं चाहता।
सरकार ने जो निर्णय दिया है उसके दो मुद्दों के खिलाफ रायबहादुर राजा तमतमा रहे हैं। अस्पृश्यों को उनकी संख्या के अनुपात में कम जगहें मिली हैं, यह उनका पहला मुद्दा है, तथा, इस निर्णय के कारण अस्पृश्य समाज हिंदुओं से अलग हुआ, यह उनके दुख का दूसरा मुद्दा है। रायबहादुर जी की इस शिकायत से मैं भी सहमत हूं कि जनसंख्या के अनुपात में अस्पृश्यों को कम जगहें मिली हैं। लेकिन इसके लिए गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने गए हमारे दो प्रतिनिधि जिम्मेदार हैं। हमने अस्पृश्यों के हितों के साथ विश्वासघात किया, यह आरोप हम पर लगाने से पहले रायसाहब इस बात पर भी तनिक गौर कर लेते तो बेहतर होता कि केंद्रीय समिति में थे, तब उन्होंने क्या गुल खिलाए थे। उस समिति की रिपोर्ट में मद्रास को 150 में से केवल 10, मुंबई को 144 में से केवल 8, बंगाल को 200 में से सिर्फ 8, उŸार प्रदेश के अस्पृश्यों को 182 में से केवल 8, पंजाब में 150 में से केवल 6, बिहार और उडीसा में 150 में से केवल 6, मध्यप्रांत और वर्हाड में 125 में से केवल 8 और असम में अस्पृश्य एवं अन्य पिछड़ी जंगली जातियों के लिए 75 में से केवल 9 जगहें दी गई थीं। यह बंटवारा अस्पृश्यों की जनसंख्या के अनुपात में बहुत ही अपर्याप्त है और रायबहादुर राजा इस समिति के एक सदस्य थे! सरकार ने जातियों के बारे में जो निर्णय किया है, उसमें अस्पृश्यों के लिए कम जगहें होने के लिए हमें जिम्मेदार ठहराने से पहले वे इस बात का संतोषजनक स्पष्टीकरण दे सकते हैं क्या? इस पर विचार करें कि वे जब केंद्रीय समिति के सदस्य थे तब हुई इस काट-छांट को उन्होंने कैसे चुपचाप बर्दाश्त किया? उस समय इसके खिलाफ कोशिशें क्यों नहीं कीं इसका जवाब क्या रायबहादुर राजा के पास है? अगर रायबहादुर को लगता था