330 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कि अस्पृश्यों को उनकी जनसंख्या के आधार से जगहें मिलना अस्पृश्य समाज का जन्मसिद्ध अधिकार है, आत्मरक्षा के लिए उसे वह अधिकार पूर्ण रूप से प्राप्त होना बेहद आवश्यक और अपरिवर्तनीय घटना है, तो फिर ऐसा ही होना चाहिए इस बात पर वे आग्रही क्यों नहीं रहे? केंद्रीय समिति का सदस्य बनने का जो मौका उन्हें मिला था उसका उन्होंने इस बात को मनवाने के लिए लाभ क्यों नहीं उठाया?
रायबहादुर की इस शिकायत में कि, सरकार ने जो निर्णय दिया है, उसके कारण अस्पृश्य समाज को हिंदू समाज से अलग किया गया है, मुझे कोई दम नजर नहीं आता। (डॉ. मुंजे को भी ऐसा नहीं लगता।) पृथक चुनाव क्षेत्र के खिलाफ अगर रायबहादुर राजा जैसे लोगों की विवेकबुद्धि को आपिŸा हो तो ऐसा नहीं कि उन पर पृथक चुनाव क्षेत्र से चुनाव लड़ने या अपना मत देने की जबरदस्ती की जा रही हो। बल्कि इस निर्णय ने उन्हें संयुक्त या सार्वजनिक चुनाव क्षेत्र से उम्मीदवार बन कर चुनाव लड़ने का और मत देने का अधिकार दिया गया है। वे इस अधिकार का प्रयोग कर सकते हैं। हिंदुओं के दृष्टिकोण में आमूलचूल बदलाव आया है। तथा अस्पृश्यों के बारे में इन छह-सात महीनों में ही (उनके डॉ. मुंजे से हाथ मिलाने के बाद से) स्पृश्य हिंदुओं का विचार परिवर्तन हुआ है ऐसा रायबहादुर राजा डंके की चोट पर सबसे कहते फिर रहे हैं। उनके इस नए कथन पर जिन अस्पृश्य लोगों को विश्वास नहीं होता और जो अलग चुनाव क्षेत्र की मांग करते हैं, उन लोगों को यकीन दिलाने के लिए ही सही रायबहादुर राजा जैसे लोगों को चाहिए कि वे संयुक्त चुनाव क्षेत्र से लड़ कर चुनाव जीत कर दिखाएं और सिद्ध करें कि अस्पृश्यों को अलग चुनाव क्षेत्र की जरूरत नहीं है। अस्पृश्य समाज के बारे में प्रेम और सहानुभूति का दावा करने वाले हिंदू भी रायबहादुर राजा जैसे लोगों को चुन कर दिखा दें कि उनका कहना सही है। इस निर्णय से अपने मत की सत्यता साबित करने का मौका उन्हें भी उपलब्ध हो रहा है।
सरकार का यह निर्णय अन्य मामलों में भले अधूरा हो, लेकिन अलग चुनाव क्षेत्र की मांग करने वालों को और संयुक्त चुनाव क्षेत्र चाहने वालों को संतुष्ट करने की व्यवस्था एक साथ इस निर्णय से हो गई है। इस नजरिए से और सिर्फ अस्पृश्य समाज के बारे में ही कहना हो तो यह जरूर कहा जा सकता है कि यह निर्णय सुलह (Compromise) की तरह है और इसीलिए दोनों पक्षों की मान्यता इसे मिलना सही रहेगा।
गांधीजी के बारे में बोलना हो तो वे क्या चाहते हैं यही साफ नहीं है। कुछ लोग यह मानते हैं कि गांधीजी भले ही पृथक चुनाव क्षेत्र के खिलाफ हों लेकिन वे संयुक्त चुनाव क्षेत्र और आरक्षित जगहों के खिलाफ नहीं हैं। लेकिन यह बहुत बड़ी भूल है। आज भले उनका मत बदला हो, लेकिन जब लंदन में थे तब उन्होंने स्पष्टता से घोषणा की थी कि अस्पृश्यों को हिंदुओं से अलग राजनीतिक अस्तित्व देने की