56. अपने लोगों के न्यायपूर्ण अधिकारों के लिए लड़ते हुए अगर किसी ने रास्ते के लालटेन लगाने के खंभे पर फांसी चढ़ाया तो भी मुझे उसकी परवाह नहीं - नवंबर, 1931 लंदन (खत) - Page 348

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कोई भी योजना उन्हें पसंद नहीं है। अस्पृश्यों को ही नहीं वरन् संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र की आरक्षित जगहों की योजना के बारे में भी उन्होंने लंदन में यही कहा था कि इस तरह का आरक्षण उन्हें पसंद नहीं है और वे इसका पुरजोर विरोध करते हुए प्राणांतिक अनशन भी कर सकते हैं। वयस्क मताधिकार और चुनावों में अपना मत देने के अधिकार के अलावा अस्पृश्यों को अन्य कोई भी कानूनी रियायत देने के लिए गांधीजी तैयार नहीं थे। लंदन में उन्होंने यही नीति अपनाई हुई थी। आगे मेरे साथ बातचीत करते हुए मुझे समझाने के लिए एक योजना उन्होंने आखिर में प्रस्तुत की। जो योजना उन्होंने प्रस्तुत की थी वह किसी काम की नहीं थी, लेकिन उसे भी कानूनी जामा पहनाने के लिए या अनुमोदन देने के लिए वे तैयार नहीं थे।

गांधीजी की इस योजना के अनुसार अस्पृश्य वर्ग का उम्मीदवार चुनाव लडे़गा। उसी जगह से उच्च वर्ग के अन्य उम्मीदवार भी चुनाव लड़ेंगे। इस तरह चुनाव होने के बाद अगर अस्पृश्य उम्मीदवार हार जाए तो वह नतीजों के खिलाफ मुकदमा दायर करे। उस अर्जी के अनुसार अगर न्यायाधीश निर्णय दे कि ‘अस्पृश्य वर्ग का होने के कारण उम्मीदवार चुनाव हार गया’ तो मैं इस तरह की व्यवस्था करूंगा कि चुना गया कोई उच्चवर्णीय उम्मीदवार उसके लिए अपनी जगह से इस्तीफा दे देगा। उस जगह के लिए फिर से होने वाले चुनावों में अस्पृश्य उम्मीदवार और अगर चाहे तो इस्तीफा देने वाला उच्चवर्णीय उम्मीदवार भी खड़ा रह सकता है। अगर वह फिर से हार जाता है तो फिर इसी तरह फिर कोशिश कर सकता है। इस तरह गांधीजी की यह योजना फिर से उम्मीदवार बनो, फिर से हारो वाला एक बचकाना खेल ही था! संयुक्त संघ और आरक्षित जगहें अगर अस्पृश्य स्वीकारेंगे तो गांधीजी की विवेकबुद्धि को संतुष्टि मिलेगी मानने वाले यह समझ लें कि उनकी यह मान्यता निराधार है। केवल इसीलिए गांधीजी की इस योजना को आज मैंने यहां व्यक्त किया है। अब अगर गांधीजी ने कोई नई योजना तैयार की हो तो पहले वे उसे प्रस्तुत करें। मेरे इस आग्रह की वजह भी यही है। गांधीजी का पहले क्या कहना था, पहले उनकी योजना क्या थी, मैं जानता हूं। उनका जवाब भी मैंने उन्हें दे रखा है। उन पुरानी बातों पर फिर से माथापच्ची करने का कोई मतलब नहीं है। इसलिए, मेरा आग्रह है कि अगर कोई नई बात हो तो गांधीजी उसे प्रस्तुत करें।

गांधीजी या काँग्रेस को जो योग्य और न्यायपूर्ण लगता है वही अस्पृश्य समाज के साथ घटेगा इस मौखिक आश्वासन को ही केवल स्वीकारना मेरे लिए संभव नहीं होगा यह मैं पहले ही बता देता हूं। मेरे अस्पृश्य बंधुओं के हितों की रक्षा के महत्वपूर्ण और दिल से जुड़े मसले के बारे में मैं केवल शाब्दिक आश्वासनों और कागजी करारनामों का भरोसा नहीं कर सकता। गांधीजी महात्मा होंगे लेकिन वे अमर नहीं हैं, न ही सर्वव्यापी हैं। अगर हम मान भी लें कि काँग्रेस उच्च वर्ग के वैभव को बरकरार रखने वाली, गरीबों को रौंदने वाली और अपनी हुकूमत में रखने