332 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
की कोशिश करने वाली अरिष्टकारी संस्था नहीं है, फिर भी, जरूरी नहीं कि हमेशा वही सबसे बड़ा पक्ष बनी रहेगी। यह भी जरूरी नहीं कि कॉँग्रेस का दबदबा हमेशा कायम रहे। अस्पृश्यता खत्म करना और अस्पृश्य जनता को हिंदू समाज में शामिल कर लेने की कोशिश करने वाली महान आत्माएं इस भूमि में इससे पूर्व भी पैदा हुई हैं हालांकि उनमें से किसी को इस काम को पार लगाने में सफलता नहीं मिली। कई महात्मा पैदा हुए और मर गए परंतु अस्पृश्य अस्पृश्य ही रहे।
हिंदू समाज सुधारकों के सुधारों की गति मुल्ला की दौड़ की तरह सीमित है और उनका भरोसा ऐन समय पर साथ छोड़ देने वालों जैसा है, यह मैं महाड़ और नासिक की घटनाओं से जान चुका हूं। सो, जो अस्पृश्यों के सच्चे हितचिंतक हैं, वे यह सलाह हर्गिज नहीं देंगे कि ऐन समय पर धोखा देने वाले हिंदू सुधारकों के हाथ में अस्पृश्यों का भविष्य सौंपा जाए। ऐसे लोग अस्पृश्यों की मदद नहीं कर सकते जो अपने जातभाइयों का मन न दुखाने या उन्हें गुस्सा न दिलाने के चक्कर में ऐन समय पर अपने तत्वों के साथ समझौता कर लें।
यही वास्तविक स्थिति होने की वजह से कानूनी सुरक्षा बंधनों के प्रति मुझे आग्रही रहना ही होगा। गांधीजी की अगर यह इच्छा है कि जातियों के बारे में निर्णय बदला जाए, तो उन्हें दूसरी योजना बनानी होगी और आज अस्पृश्यों को जो भी कुछ प्राप्त है, उससे अधिक हित अपनी नई योजना में है और उस योजना को अमली जामा पहनाने के लिए जरूरी सभी कानूनी व्यवस्था उसमें है यह साबित करके भी दिखाना होगा। मुझे आशा है कि, गांधीजी ने जो यह अंतिम चेतावनी का मार्ग स्वीकारा है उसे वे छोड़ देंगे। पृथक चुनाव क्षेत्र की मांग के पीछे हमारी मंशा हिंदू समाज का अहित करने की नहीं है। हमारा भविष्य हम अपने हाथ में रखना चाहते हैं। स्पृश्य हिंदुओं की खुशी पर या उनकी मर्जी की लहर पर हमारा भविष्य पहले की तरह पूरी तरह निर्भर न हो इसी एक उद्देश्य से प्रेरित होकर हमने यह मांग की है। गांधीजी अंग्रेजों से कहते हैं कि गलतियां या पाप भी करने का अधिकार हमें प्राप्त है। हमें भी वह अधिकार प्राप्त है और होना भी चाहिए, इतना ही हम गांधीजी से कहना चाहते हैं और हमारा अधिकार छीन लेने की कोशिश वे नहीं करेंगे, ऐसी उनसे उम्मीद रखता हूं।
अन्नत्याग कर अपने प्राणों का त्याग करने की दुर्धर प्रतिज्ञा उन्हें किसी दूसरे दुर्धर कार्य के लिए सम्हाल कर रखनी चाहिए थी। हिंदू और मुसलमान या स्पृश्य और अस्पृश्य वर्गों के बीच के दंगों या खूनख्रराबे को रोकने के लिए अगर उन्होंने यह प्रतिज्ञा की होती तो मैं उसकी सहजता और उसका महत्त्व समझ सकता था। उनकी इस योजना से न अस्पृश्य समाज का हित होगा और न ही उनके दुखों का भार कम होगा। गांधीजी को इन परिणामों का अहसास हो या न हो लेकिन उनके