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कृत्यों की परिणति आखिर अत्याचारों में ही होगी। देश भर की अस्पृश्य जनता को उनके हिंदू अनुयायियों से या चाहनेवालों से परेशान किया जाएगा। लेकिन इन अत्याचारों की वजह से वे हिंदू समाज से जुडे़ नहीं रहेंगे, दूर चले जाएंगे। गांधीजी अगर अस्पृश्यों से यह सवाल करें कि, आप हिंदू समाज चाहते हैं या राजनितिक समाज की हिस्सेदारी चाहते हैं, तो मुझे यकीन है कि वे यही कहेंगे कि हिंदू समाज से अधिक राजनीतिक सŸा ही हमें महत्वपूर्ण लगती है। उनसे यह साफ तौर पर कहने के लिए और गांधीजी को आत्महत्या की प्रतिज्ञा से बचाने के लिए अस्पृश्य जनता एकदम तैयार होगी। इन सभी बातों का ऐसे परिणामों को ध्यान में रखते हुए गांधीजी अगर शांतिपूर्ण ढंग से सोचेंगे तो इन उपायों से होने वाला अपना जयकार, या अपनी प्रतिज्ञा की विजयशाली पूर्तता प्राप्त करने लायक है, ऐसा गांधीजी को भी शायद नहीं ही लगेगा।
इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि गांधीजी अपने इन कृत्यों से हिंदू जनता के अदमनीय और नाकारा विकारों को बेलगाम कर रहे हैं। उनके इस कृत्य के कारण स्पृश्य और अस्पृश्य के बीच की द्वेषबुद्धि खत्म नहीं होगी बल्कि बढ़ जाएगी। दोनों समाजों के बीच का अंतर पाटे जाने के बजाय बढ़ेगा। क्योंकि, गोलमेज सम्मेलन में गांधीजी की नीतियों का जब मैंने अस्पृश्यों की ओर से विरोध किया तो इस देश में मेरे खिलाफ बड़ा हल्ला मचाया गया। राष्ट्रीय कहलाने वाले सभी हिंदू पत्रकारों ने तथा देशभक्तों ने मुझे राष्ट्रद्रोही आदि कई गालियां देने की और मेरे बारे में जहां तक संभव हो सके उतनी गलतफहमियां फैलाने की मानो ठान ली थी। दुनिया के सामने यह दिखाने के लिए कि पूरा अस्पृश्य समाज मेरे खिलाफ है, स्पृश्य वर्ग के हिंदू सुधारकों ने भी कई झूठी संस्थाएं बनाईं और ऐसी सभाओं की जाली रिपोर्टें बनवाई जो कभी हुई ही नहीं। उन बड़ी-बड़ी जाली रिपोर्टों को राष्ट्रीय अखबारों में प्रकाशित करने की भी उनमें मानो होड़ मची थी। मेरी तरफ से आने वाले पत्र और अन्य डाक को दबाने का और उन्हें प्रकाशित न करने का मानो सभी राष्ट्रीय अखबारों ने जालसाज़ी ही की थी।
‘सिल्वर बुलेट’ यानी पैसों का लालच देकर अस्पृश्य वर्ग के कुछ लोगों को मेरे खिलाफ नारेबाजी करने के लिए खड़ा किया गया। कुछ जगहों पर स्पृश्य और अस्पृश्य समाज में झड़पें होकर थोड़ा बहुत खून भी गिरा। ये सभी अनिष्ट एवं अनर्थकारी बातें अधिक बडे़ पैमाने पर न घटें, ऐसा अगर गांधीजी को लगता हो तो कृपा कर वे एक बार फिर से सोचें और भविष्य की अनर्थकारी घटनाओं की शृंखला को टालें। मुझे नहीं लगता गांधीजी ऐसा अनर्थ चाहते होंगे। लेकिन अगर वे अपनी प्राणघातक प्रतिज्ञा से पीछे नहीं हटे तो अपने किए से कोई भयंकर परिणाम न निकलें ऐसी उनकी इच्छा हो तो भी उसके कोई मायने नहीं रहेंगे। दिन बीतने के बाद रात होती है, यह जितना