334 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
स्वाभाविक है उतना ही गांधीजी की इस प्रतिज्ञा की परिणति अत्याचार और अनर्थ में होना स्वाभाविक है। आखिर मैं जनता का ध्यान एक बात की ओर दिलाना चाहता हूं और वह यह है कि इस बारे में मुझे किसी से भी बातचीत करने की जरूरत नहीं है कहने का पूरा अधिकार मुझे होते हुए भी सिर्फ गांधीजी के लिए इस सवाल से संबंधित उनकी किसी भी नई योजना के बारे में सोचने के लिए मैं तैयार हूं। और मुझे आशा है कि गांधीजी ऐसा कठिन और नाजुक समय मुझ पर कभी आने नहीं देंगे कि जब उनके प्राण और मेरे लोगों के हक इन दोनों में से किसी एक बात को मुझे चुनना पडे़। क्योंकि अगर ऐसा समय आए तो मैं किस बात को चुनूंगा यह बिन बताए ही समझा जा सकता है। चाहे कुछ भी हो स्पृश्य समाज के हाथों मैं अपने समाज का भविष्य सौंपने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हूं.... ख्1,
”अस्पृश्यों को पृथक चुनाव क्षेत्र मिलने पर, उसे निरस्त करने के लिए मैं अपने प्राणों की बाजी लगा कर कोशिश करूंगा“, अपनी इस प्रतिज्ञा पर 20 सितंबर, 1932 से अमल करना गांधीजी ने तय किया है इस कारण पूरे हिंदुस्तान के हिंदू नेताओं की अतिशीघ्र बैठक 19 सितंबर 1932 के दिन लेना तय हुआ। हिंदुस्तान के सर्वश्रेष्ठ नेता माने जाने वाले महात्मा गांधी के प्राणों की बाजी लगते देख बनारस से पंडित मालवीयजी मुंबई आए। राजेंद्रप्रसाद, सी. राघवाचार्य, पंडित कुंजरू, डॉ. मुंजे, टी. प्रकाशम, डॉ. चौथिराम, स्वामी सत्यानंद, मि. अणे आदि अन्यान्य प्रांतों के प्रतिनिधि उपस्थित थे। अस्पृश्य समाज से रा. ब., एम. सी. राजा, गवई, मि. शिवराज, मि. जगन्नाथम्, मि. धर्मलिंगम, मि. मंडल आदि अन्य प्रांतों से आए लोग थे। मुंबई प्रांत से सर चुनिलाल, डॉ अम्बेडकर, डा.ॅ सोलंकी, हिराचंद वालचंद, सर सेटलवाड, सर माडगावकर, सर पुरुषोŸामदास, श्री देवधर, मि. नटराजन, रा. ब. वैद्य, डॉ. देशमुख, दलवी, सुभेदार, सेठ बिड़ला, मि. करंदीकर, सावरकर, शिवतरकर, पी. बालु, निकालजे आदि लोग उपस्थित थे। महिलाओं में से मिसेज कमला नेहरू, पेरनी कैप्टन, मोशोन कैप्टन, सौ. अवंतिकाबाई गोखले, मिसेस अन्नपूर्णाबाई देशमुख, रतनबेन मेहता, मिस नटराजन आदि लोग हाजिर थे।
”इंडियन मर्चेंटस हॉल“ में सभा होनी थी। इस परिषद पर महात्मा गांधी का भवितव्य आधारित था। इसलिए परिषद का वातावरण काफी गंभीर था। परिषद को डॉ. अम्बेडकर की नीति पर भरोसा था। डॉ. अम्बेडकर भी परिषद में हाजिर रहेंगे, इस बात का पता चलते ही परिषद के आयोजकों को तथा परिषद में उपस्थित रहने वाले नेताओं को कुछ राहत महसूस हुई। इस परिषद का कोई भी कार्यक्रम पहले से तय नहीं किया गया था।
- जनता : 24 सितंबर, 1932