56. अपने लोगों के न्यायपूर्ण अधिकारों के लिए लड़ते हुए अगर किसी ने रास्ते के लालटेन लगाने के खंभे पर फांसी चढ़ाया तो भी मुझे उसकी परवाह नहीं - नवंबर, 1931 लंदन (खत) - Page 352

335

हर पार्टी के नेताओं में खलबली मची हुई दिखाई दे रही थी। कौन क्या कह रहा है तथा किसके क्या बोलने से परिषद के उद्देश्य के अनुसार किस तरह की सुलह होना संभव है, इसी तरफ सबका ध्यान लगा हुआ था। परिषद के कार्यक्रम के लिए उपयोगी सिद्ध हो इसीलिए डॉ. अम्बेडकर ने अपना मत साफ और निर्भीक ढंग से घोषणा-पत्र के जरिए अखबारों को भेज दिया था। डॉक्टर का वक्तव्य पढ़ कर वहां इकट्ठा हुए नेताओं को आगे की कार्रवाई की रूपरेखा बनाने में और सोचने-विचारने में आसानी हुई।

परिषद की शुरुआत से पहले श्री हिराचंद वालचंद ने कुल कामकाज के बारे में बताते हुए पंडित मालवीय जी को अध्यक्षस्थान ग्रहण करने की विनति की। पंडितजी के चेहरे पर गंभीरता छाई हुई थी। परिषद का कार्य जितना महत्त्वपूर्ण था उतना ही गंभीर भी था। पंडितजी ने अपने भाषण की शुरुआत में सभी नेताओं को इस विकट स्थिति में सुलह की आसान राह निकालने की आवश्यकता बताई। महात्मा गांधी के प्राण बचाने का उद्देश्य सामने रखते हुए दोनों पक्ष जिसे स्वीकार लें ऐसी कोई योजना बनाने की विनति की।

पंडितजी की विनती के अनुसार पहले डॉ. अम्बेडकर बोलने के लिए खडे़ हो गए। उन्होंने बड़ी निर्भीकता और ईमानदारी के साथ अपना मत परिषद के सामने रखा। अपना पक्ष रखते हुए उन्होंने कहा,

”परिषद का कार्यक्रम देख कर मुझे लगा कि इसका कोई फायदा नहीं है। महात्मा गांधी हमारी मांगों का विरोध करते हैं। उसके लिए उन्होंने अपने प्राणों की बाजी लगाई है। सबको यह लगना स्वाभाविक है कि महात्मा गांधी के मूल्यवान प्राणों की रक्षा हो। लेकिन अपने प्राणों की बाजी लगाने से पहले गांधीजी को चाहिए था कि वे कोई अन्य योजना लोगों के सामने रखते। आज के हालात के बारे में सोचते हुए मुझे तीव्रता से लगता है कि गांधीजी की नई योजना के बगैर सुलह के सभी तरीके बेकार हैं। और अगर साफ-साफ बताना हो तो इससे आगे तय करने लायक कुछ बचता ही नहीं। इस परिषद में भले गहराई से सोच-विचार हो लेकिन जब तक महात्मा गांधी की असल योजना का साफ-साफ पता नहीं चलता है तब तक कम से कम मुझे तो कोई मार्ग दिखाई नहीं देता है। और मैं आप सब लोगों को भी बता रहा हूं कि मैं इस परिषद के आयोजकों के या यहां के किसी भी नेता की किसी भी योजना के साथ बंधा हुआ नहीं हूं। मैं सिर्फ महात्मा गांधी का कहना क्या है इसी पर सोचूंगा। उनकी योजना के बारे में जब तक कुछ पता नहीं चलता तब तक मैं आगे क्या कह सकता हूं? पहले पता कीजिए कि वे क्या कहना चाहते हैं। साथ ही, स्पृश्य नेता उनके प्रतिनिधि के तौर पर उनके विचार ले आएंगे उसी पर मैं सोचूंगा। किसी भी अस्पृश्य नेता द्वारा लाई गई उनकी किसी योजना पर मैं नहीं