56. अपने लोगों के न्यायपूर्ण अधिकारों के लिए लड़ते हुए अगर किसी ने रास्ते के लालटेन लगाने के खंभे पर फांसी चढ़ाया तो भी मुझे उसकी परवाह नहीं - नवंबर, 1931 लंदन (खत) - Page 354

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दिन बॅ. जयकर की ओर से डॉ. अम्बेडकर को सुबह दस बजे बिड़ला हाऊस में बुलाया गया था। डॉ. अम्बेडकर डॉ. सोलंकी के साथ गए भी थे। बिड़ला हाऊस में बॅ. जयकर, तेजबहादुर सप्रू और पंडित मदनमोहन मालवीय के साथ महात्मा गांधी की नई योजना पर चर्चा हुई। इस नई योजना के आधार से केवल सुलह-सफाई के तौर पर एक तात्कालिक योजना बनाना तय हुआ।

दोपहर ठीक बारह बजे, दूसरे दिन के काम की शुरुआत हुई। लेकिन आज विशेष चर्चा किए बगैर एक छोटी-सी कमेटी का गठन कर, समझौते से निर्णय तैयार करने की बात पहले से तय की गई थी। पहले पुणे होकर आए प्रतिनिधिमंडल के सर चुनिलाल मेथा ने महात्मा गांधी का समझौते से संबंधित नया निर्णय बैठक में सबके सामने रखा। आज बैठक में सर तेज बहादुर सप्रू, बॅरिस्टर जयकर आदि लोग उपस्थित थे। अध्यक्ष पंडित मालवीय जी ने सभा की शुरुआत करने से पहले सबको बताया कि यह जरूरी है कि सभा का काम संक्षेप में हो इसलिए बेवजह चर्चा को टाल कर आगे की कार्रवाई के लिए एक छोटी समिति का गठन करना होगा। उसके बाद चुनिलाल जी ने म. गांधी का कहना क्या है यह बताया-

  1. म. गांधी अस्पृश्यों को पृथक चुनाव क्षेत्र देने के विरोध में हैं।

  2. साथ ही, संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र और आरक्षित जगहों की योजना के लिए भी वे राजी नहीं हैं। फिर भी मुंबई में हुई अखिल हिंदू परिषद में आरक्षित जगहों के बारे में अगर पहले से तय की गई कुछ बातों के साथ अगर निर्णय तैयार किया जाए तो उन्हें आपिŸा नहीं होगी, हालांकि यह भी नहीं कहा जा सकेगा कि उसे उनकी मान्यता होगी। अगर कोई समझौता हुआ तो शायद वे उसे अपनी सहमति देंगे। इस दौरान सर चुनीलाल ने आरक्षित जगहों के बारे में संतोषजनक तरीके से जानकारी नहीं दी, इसलिए सर सेटलवाड को बातों का स्पष्टीकरण देना पडा था।

महात्मा गांधी की योजना के बाद डॉ. अम्बेडकर बोलने के लिए उठे। उनका आज का भाषण बहुत ही उत्साहवर्धक और हृदयस्पर्शी हुआ। उन्होंने कहा,

”आज के कठिन हालात में हो रही इस बातचीत में मेरी हालत अन्य सभी की तुलना में बहुत ही विचित्र-सी है। शांति की इस सुलह में सिर्फ मुझे अपने लोगों के न्यायपूर्ण अधिकारों की सुरक्षा के लिए खलनायक की भूमिका निभानी पड़ रही है। अपने इस न्यायपूर्ण और लोकहित के काम को करते हुए, मुझे चाहे जितनी मुश्किलों का सामना ही क्यों न करना पड़े, इतना ही नहीं, अगर किसी ने पास ही के बिजली के खंभे पर मुझे तुरंत फांसी पर चढ़ाया, तब भी मैं उसकी परवाह नहीं करूंगा। आज हमारे सामने जो सवाल उपस्थित हैं वे केवल भावनाओं के सहारे हल नहीं किए जा सकते, गुलामी में पिस रहे हमारे अनगिनत बंधुओं के न्याय अधिकारों के