56. अपने लोगों के न्यायपूर्ण अधिकारों के लिए लड़ते हुए अगर किसी ने रास्ते के लालटेन लगाने के खंभे पर फांसी चढ़ाया तो भी मुझे उसकी परवाह नहीं - नवंबर, 1931 लंदन (खत) - Page 358

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पुणे करार की बातचीत के दौरान बाबासाहेब ने जो रुख अपनाया था, उसके कारण देश भर में उनके बारे में वातावरण कलुषित हुआ। उनके नाम धमकी भरे

खत लिखे जाने लगे। उनमें से एक खत गुजराती भाषा में था। उस खत को 1 अक्तूबर, 1932 को जनता अखबार के पृष्ठ क्रमांक 3 पर प्रकाशित किया गया था।

खत इस तरह था -

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डॉ. अम्बेडकर,

जो तमें दिवस 4 मां महातमा गांधीनी मागणी मंजूर करशो नहीं तो तमारी जान लोवामां आवशे। माटे जो तमारू जीवन तमोने वहालुं होय तो महातमा गांधीजीनी मागणी मंजूर करीने ते ओने उपवास मांथर जलदी छोडावो. आ चेतवणी छेल्ली छे हवे जुदी तकरार छोडी देशो नहीं तो तमारी खून करवामां आवशे.

ली. हरिभाई के. भट

B.P.E.E. ना एक मेंबर अने वर्कर

पुणे के कुछ स्पृश्य वर्ग के युवकों ने बाबासाहेब की जान लेने का गुप्त षडयंत्र रचा था। उसके बारे में खबर 24-9-32 के जनता के अंक में (पृ. 8) दी गई थी जो इस प्रकार थी :-

डॉ. अम्बेडकर की जान को खतरा

पुणे के छात्रों की गुप्त सभा। हत्या की धमकी

पुणे दि. 23-9-32 समय : रात के आठ.

(जनता के खास प्रतिनिधि द्वारा भेजी गई खबर)

दो दिन हुए। बातचीत जारी है। डॉ. अम्बेडकर को दबाने के कई प्रयास किए जा रहे हैं। गवर्नर पर गोली चलाने वाले गोगटे पंथ के, पुणे के रहने वाले कुछ छात्र गुप्त षड्यंत्र रच रहे हैं, ऐसी खबर प्रकाशित हुई है। डॉ. अम्बेडकर को गायब कर देने से कई समस्याएं अपने आप हल हो जाएंगी और गांधीजी की जान भी बचेगी, इस तरह की बातें चल रही हैं। डॉ. अम्बेडकर को जब यह बात बताई तब वह पल भर हंसे। शायद कहना चाहते हों, ऐसी डरपोक मृत्यु से मैं नहीं डरता। लेकिन यहां के अस्पृश्य समाज को डॉ. अम्बेडकर साहेब की सुरक्षा के बारे में बहुत चिंता हो रही है और वे उनकी सुरक्षा के प्रति सचेत हैं। डॉ. बाबासाहेब का अगर बाल भी बांका हो तो भी भयंकर अनर्थ हो जाएगा। उनके खून की एक बूंद भी बहे तो हजारों अस्पृश्य युवक बलिदान के लिए खडे़ मिलेंगे। गांधीजी की दुर्दैवी प्रतिज्ञा का अंत ऐसे भयंकर परिणामों के साथ न हो यही सबकी इच्छा है।