344 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
आश्चर्यजनक बात सामने आई, वह थी - डॉ. अम्बेडकर ने जब उपर्युक्त मुद्दा सामने रखा तब उन्हें बताया गया कि राजा-मुंजे करार में जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधि देने की जो बात कही है उसमें जनसंख्या का अनुपात यानी कुल जनसंख्या नहीं वरन् हिंदू जनसंख्या का अनुपात यही मतलब था। सभा में डॉ. मुंजे थे नहीं और मि. राजा को आने से मना कर दिया गया था। सो, इन दोनों के मतानुसार करार का क्या मतलब था यह जाना नहीं जा सका। डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि, मि. राजा ने बार-बार जो कोष्ठक प्रकाशित किए हैं उनके सहारे यह कहा जा सकता है कि उनके लिए इसका मतलब कुल जनसंख्या ही था। उनका जवाब देते हुए कमेटी में कहा गया कि हाल ही में इस विषय पर रा. ब. राजा के साथ चर्चा की गई थी और उन्होंने कहा था, डॉ. मुंजे के साथ जो करार किया गया था, उसमें मेरे मतानुसार जनसंख्या का अनुपात हिंदू जनसंख्या के अनुपात में ही है। रा. ब. राजा और उनकी पार्टी के लोग कितने पराधीन और परावलंबी हो गए थे इसका केवल इसी एक बात से अंदाजा लगाया जा सकता है। हिंदुओं के साथ हाथ मिलाने के लिए अगर अस्पृश्यों के राजनीतिक अधिकारों को दांव पर लगाना पडे़ तो उसके लिए भी वे तैयार थे। रा. ब. राजा ने जनसंख्या के अनुपात के बारे में जो कुछ अब कहा था, वह उनकी चालाकी थी, इसमें कोई दो राय नहीं। डॉ. अम्बेडकर को उनकी चालाकी पर से पर्दा उठाने के लिए ज्यादा समय नहीं लगा। आखिर केंद्रीय विधिमंडल परिषद में अस्पृश्यों के लिए सामान्य जगहों में से 18 प्रतिशत जगहें आरक्षित रखने की बात तय हुई और इस तरह प्रश्न का हल किया गया। उसके बाद अस्पृश्यों के संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र कितने समय तक रहेंगे और वे किन शर्तों पर खारिज किए जाएंगे इस मसले पर विचार-विमर्श शुरू किया गया। उम्मीद के विपरीत इस प्रश्न पर जंग छिड़ गई। हिंदू नेता चाहते थे कि दस साल के बाद यह रियायत अपने आप खत्म हो जाए। डॉ. अम्बेडकर का मत था कि इस रियायत को कम से कम 15 सालों तक लागू किया जाए और उसके बाद तभी हटाई जाए जब अस्पृश्य वर्ग के मतदाताओं से लिए गए मतों से साबित हो कि बहुमत के कथनानुसार अब उन्हें इस रियायत की जरूरत नहीं है। अगर बहुमत न हो तो रियायत जारी रखी जाए। दोपहर में दो बजे से लेकर रात के साढे़ नौ बजे तक गर्मागर्म बहस हुई। कोई पक्ष पीछे हटने के लिए तैयार नहीं था इसलिए सुलह खत्म होने के आसार नजर आने लगे। आखिर यह तय हुआ कि इस मसले के बारे में दोनों पक्ष अपने मत महात्मा गांधी के सामने रखेंगे और उनका इस मामले में क्या कहना है यह जान लेंगे। रात के 9.30 बजे सब लोग येरवडा के कारागार में महात्माजी से मुलाकात करने गए। पहले डॉ. अम्बेडकर ने अपना पक्ष सामने रखा। उनके बाद हिंदुओं की ओर से पंडित मदन मोहन मालवीय जी बोले। अचरज की बात यह थी कि दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद महात्मा गांधीजी ने डॉ. अम्बेडकर के पक्ष में अपना मत दिया। इस निर्णय