56. अपने लोगों के न्यायपूर्ण अधिकारों के लिए लड़ते हुए अगर किसी ने रास्ते के लालटेन लगाने के खंभे पर फांसी चढ़ाया तो भी मुझे उसकी परवाह नहीं - नवंबर, 1931 लंदन (खत) - Page 362

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के बाद विवाद का एक बड़ा सवाल हल हो गया। लोग करीब 11.30 बजे जेल से शिवलाल मोतीलाल जी के बंगले पर लौट आए। बाकी कामकाज दूसरे दिन करने का निर्णय करते हुए रात 12.30 बजे सभा विसर्जित हुई। शनिवार 24 सितंबर, 1932

तय कार्यक्रम के अनुसार दूसरे दिन सुबह 8.30 बजे फिर सभा का कामकाज शुरू हुआ। सबको उम्मीद थी कि आज किसी बडे़ मुद्दे पर चर्चा नहीं होनी है, इसलिए जल्द ही सुलह होगी और करारनामा बन जाएगा। लेकिन कामकाज की शुरुआत में ही बहस ने उग्र रूप धारण किया। इतनी उग्रता धारण की कि एक बार फिर बहस ने गंभीर रूप धारण किया। पहले पांच सालों के बाद अस्पृश्यों के जनमत संग्रह ;तममितमदकनउ) लिए जाएं और अगर उन्होंने इस रियायत को खत्म करने के विरोध में मत दिए, तो अगले पांच सालों तक फिर उसे जारी रखा जाए और अगले पांच या दस सालों में उसे स्वयंमेव खत्म होने दिया जाए, इस बात पर हिंदू अड़ गए थे। डॉ. अम्बेडकर का कहना था कि पहले दस सालों के बाद जनमत संग्रह परखा जाए। उन्होंने पांच सालों के बाद जनमत संग्रह लेने को मंजूरी देने से इनकार किया। साथ ही कुछ सालों के बाद अस्पृश्य वर्ग के जनमत संग्रह के बगैर यह रियायत खत्म हो जाने की बात का भी उन्होंने पुरजोर विरोध किया। जनमत संग्रह के बगैर यह व्यवस्था कभी भी हटाई न जाए, इस बात पर वह जमे रहे। ऐसे हालात में सबकी मति कुंठित हुई। सबको लगा कि ऐसे में सुलह होना संभव नहीं। एक बार फिर महात्मा जी से मिल कर उनकी राय जानने की इच्छा डॉ. अम्बेडकर ने प्रकट की। उसके अनुसार डॉ. अम्बेडकर, राजगोपालाचारी और मि. बिरला साढ़े ग्यारह बजे येरव़ा की जेल में महात्मा गांधी से मिलने गए। डॉ. अम्बेडकर ने अपना मत उनके सामने रखा। उसके बाद महात्मा गांधी ने कहा कि आपकी अस्पृश्यों को दी जाने वाली राजनीतिक रियायतें उनके जनमतसंग्रह के बगैर वापिस न ली जाएं, इस मांग का मैं समर्थन करता हूं। मेरा बस इतना ही कहना है कि पहला जनमत संग्रह पांच वर्षों के बाद लिया जाए। मेरी जान आपके हाथ में है। अन्य सभी बातों में मैंने आपसे सहमति जताई है। उन्होंने पूछा, इस एक मामले में क्या आप मेरी बात नहीं मानेंगे? उसके बाद डॉ. अम्बेडकर और अन्य सभी लोग शिवलाल मोतीलाल जी के बंगले पर लौटे। कमेटी के सदस्यों को उन्होंने वहां हुई बातों की जानकारी दी। आखिर डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि महात्मा जी की बातें सुन कर मैंने पूरी तरह सोच लिया है। सोचने के बाद मुझे लगता है कि दस सालों से पहले जनमत संग्रह के लिए मैं तैयार नहीं हूं। एक बार फिर सुलह में बाधा उत्पन्न हुई और बहस उग्र होती गई। घंटे-डेढ घंटे तक हुई बहस के बाद आखिर यह तय हुआ कि दी गई रियायतें