346 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
खत्म करने की कोई मियाद नहीं रखी जाए। दोनों पक्ष इस बात पर राजी हुए कि अन्य योजना तय होने तक दी गई रियायतें बरकरार रखी जाएं। इस योजना पर दोनों पक्षों की सहमति होने से यह विवाद खत्म हुआ। उसके बाद प्रांतिक विधिमंडल में अस्पृश्यों को कितनी जगहें दी जाएं, यही एक मुद्दा बाकी बचा था। डॉ. अम्बेडकर ने अपनी नयी योजना में 197 जगहें मांगी थीं। हिंदू लोगों का कहना था कि 123 जगहें दी जाएं। आखिर 148 जगहों पर दोनों पक्ष सहमत हुए। उसके बाद डॉ. अम्बेडकर ने अपनी योजना के दूसरे हिस्से में जो मांगें रखी थीं, उन पर विचार किया गया। हिंदू नेताओं की ओर से बताया गया कि, जिस भाषा में उन मांगों को शब्दबद्ध किया गया है उस भाषा में आज उनके लिए मंजूरी नहीं दी जा सकती, हालांकि उन मांगों के जो मूलभूत तत्व हैं वे हमें मंजूर हैं, तथा वह मंजूरी दर्शाने वाला एक मसौदा तैयार कर उसे करारनामे में शामिल करने के लिए हम तैयार हैं। इस पर डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने कहा कि फिलहाल इतने से ही हम संतुष्ट हैं, और यह मसला भी हल हो गया। यह सब होते-होते दोपहर के दो बज गए। उसके बाद लोग करारनामे का मसौदा लिखने के लिए बैठे। करीब चार बजे के आसपास मसौदा तैयार हुआ। उसके बाद करारनामे पर किस-किसके हस्ताक्षर होंगे इस बात पर विचार मंथन हुआ। मद्रास से आए सभी अस्पृश्य नेताओं का आग्रह था कि मसौदे पर रा. ब. राजा और उनकी पार्टी के लोग हस्ताक्षर न करें। उनका कहना था, राजा और उनकी पार्टी के लोगों ने अगर हस्ताक्षर किए तो हम तो करेंगे ही नहीं, बाबासाहेब को भी हस्ताक्षर करने नहीं देंगे। उसके अनुसार डॉ. अम्बेडकर और उनकी पार्टी के नेताओं के हस्ताक्षर हुए और अनुबंध तैयार हुआ। उसके बाद अन्य हिंदू नेताओं ने डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर से प्रार्थना की कि रा. ब. राजा आदि लोगों के भी हस्ताक्षर करवाने के लिए आप ही कुछ कोशिश कीजिए। क्या करें, क्या न करें सोचते-सोचते आखिर तय हुआ कि सबके हस्ताक्षर होंगे। वे एक अस्पृश्य व्यक्ति की हैसियत से उस पर हस्ताक्षर करेंगे; अस्पृश्य वर्ग की एक पार्टी के नेता के तौर पर, ‘प्रमुख जगहों पर’ वे हस्ताक्षर नहीं करें। इस निर्णय के अनुसार राजा, गवई आदि लोगों को फोन करके सर्वंटस् ऑफ इंडिया सोसायटी की इमारत से बुलाया गया। सबके हस्ताक्षर होने के बाद अंत में हस्ताक्षर करने की इजाजत उन्हें दी गई। अचरज की बात यह कि सबके बाद आने के बावजूद और ऊपर बिल्कुल जगह न होने के बावजूद जयकर और सप्रू के बीच में अपना हस्ताक्षर घुसेड़ने की गुस्ताखी उन्होंने की। हस्ताक्षरों के बाद अनुबंध तैयार हुआ। पं. मदमोहन मालवीय और डॉ. अम्बेडकर इन दोनों के हस्ताक्षर के बाद प्रधानमंत्री को अनुबंध होने की खबर तार के जरिए भिजवाई गई। साथ में अनुबंध की कुछ प्रमुख बातों के बारे में जानकारी देने वाला तार भी भेजा गया। डॉ. अम्बेडकर और रा. ब. श्रीनिवासन ने भी अपने हस्ताक्षर के साथ राज्य के मुख्य सचिव, वायसराय को तार भेज कर इिŸाला दी कि अनुबंध उन्हें