57. पूना (पुणे) समझौता बंधनकारी मान कर स्पृश्य बंधु कार्य करे - सितंबर 1932 पुणे - Page 368

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पूना (पुणे) समझौता बंधनकारी मान कर स्पृश्य

बंधु कार्य करे

पुणे में महात्मा गांधी और बाबासाहेब अम्बेडकर में सुलह हुई और एक नया कारनामा तैयार किया गया। सभी हिंदू नेताओं की मंजूरी के बाद पिछले शनिवार को उस कारनामे पर स्पृश्य और अस्पृश्य नेताओं ने हस्ताक्षर किए। कारनामा मंजूर किए जाने के बाद मुंबई में सभी हिंदू नेता इकट्ठा हुए और रविवार 25 सितंबर, 1932 के दिन कोर्ट स्थित इंडियन मर्चंटस् एसोसिएशन के हॉल में मुंबई नागरिक इमरजेंसी काउंसिल की ओर से पंडित मदनमोहन मालवीय की अध्यक्षता में दोपहर में बैठक बुला कर समझौते को मंजूरी दी गई।

पहले परिषद् के अध्यक्ष पंडित मदनमोहन मालवीय का भाषण हुआ। करारनामा तैयार करने में जिन लोगों ने पूरा सहयोग दिया उन सभी के प्रति उन्होंने आभार व्यक्त किया। हालांकि, अस्पृश्य वर्ग के नेता डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के प्रति उन्होंने प्रमुखता से आभार प्रकट किया। उन्होंने कहा कि, ”डॉ. अम्बेडकर के सहकार्य के बगैर इस प्रकार की सुलह होना बहुत मुश्किल था। करारनामे की धाराओं के बारे में इतना ही कहा जा सकता है कि स्पृश्य हिंदुओं पर उसे पूरा कर दिखाने की बड़ी जिम्मेदारी आन पड़ी है। पच्चीस लाख का फंड

अस्पृश्यता निर्मूलन के लिए धन की बड़ी जरूरत है। देश भर में जागृति की सारी कोशिशें बिना पैसे के व्यर्थ होंगी। इस कार्य के लिए एक छोटी कमेटी का गठन कर उस कमेटी के जरिए कम से कम 25 लाख रुपयों का फंड इकठ्ठा करना होगा। अगले तीन-चार महीनों में प्रत्यक्ष कार्य कर अपने हिंदू धर्म का तेज बढ़ाना, अपने दलित बंधुओं के जरिए सभी समान अधिकार उपलब्ध करा कर देना और अपने मन को शुद्ध कर उच्च-नीचता के भाव को जड़ से उखाड़ फेंकना आदि काम तुरंत हाथ में लेना जरूरी है। अपने समाज से अस्पृश्यता को यदि जड़ से मिटा देना हो, तो इस बात को हमेशा याद रखें कि अस्पृश्यता को जड़ से मिटाने के लिए महात्मा गांधी ने अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी।“

पंडितजी के दिल को छू लेने वाले भाषण के बाद पुणे में हुए समझौते को मंजूरी देने वाला मुख्य प्रस्ताव सेठ मथुरादास वसनजी खिमजी ने पेश किया।

* जनता : 1 अक्तूबर, 1932