57. पूना (पुणे) समझौता बंधनकारी मान कर स्पृश्य बंधु कार्य करे - सितंबर 1932 पुणे - Page 369

352 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

प्रस्ताव पेश करते हुए उन्होंने कहा कि, ”पुणे में हुए समझौते को मंजूरी देने में अब अंग्रेज सरकार को कोई आपिŸा नहीं होनी चाहिए। इसीलिए, और महात्मा गांधी के स्वास्थ्य की गंभीर दशा को ध्यान में रखते हुए तुरंत मंजूरी का तार (टेलीग्राम) भेज देना चाहिए।

इस प्रस्ताव को समर्थन देने के लिए सर तेजबहादुर सप्रू बोलने के लिए उठ कर खडे़ हुए। उन्होंने कहा कि, ”यह ध्यान देने योग्य है कि इस समझौते का सारा कार्य पंडित मालवीयजी की अध्यक्षता में हुआ है। पंडितजी ने अपनी कर्मठता को एक तरफ कर बदलते समय के अनुसार चलने का जो मनोधैर्य दिखाया, वह कई मायनों में अलौकिक है। हम सबको भी इस तरह की नीति अपनानी होगी, उसके अलावा कोई चारा नहीं है। इस सुलह का बहुत सा श्रेय डॉ. बबासाहब अम्बेडकर को भी देना होगा। अपने समाज के न्यायपूर्ण अधिकारों के लिए लड़ने का जो धैर्य उन्होंने दिखाया है और अपनी दृढ़प्रतिज्ञा का जो परिचय दिया है वह अभिनंदन के योग्य है। उनके धैर्य को देखते हुए लगता है कि वे अस्पृश्यों के ही नहीं वरन् भावी भारत के धैर्यशील नेता बनेंगे। अंग्रेज सरकार के कम्युनल अवार्ड से अधिक इस समझौते से अस्पृश्य वर्ग का अधिक हित हुआ है। इसीलिए आगे हम सबको मिल-जुल कर रहना होगा और जो कार्य हाथ में लिया है, उसे पार लगाने के, उसमें विजयी होने के लिए जी-जान से कोशिश करनी होगी।

डॉ. अम्बेडकर बोलने के लिए खडे़ हुए, तब तालियों की गड़गड़ाहट से वातावरण गूंज उठा। उन्होंने कहा कि,

़”कुछ दिनों पूर्व के हालात और आज के हालात देख कर मुझे सब-कुछ सपने जैसा लगता है। उस वक्त, एक ओर मुझे महात्मा गांधीजी के प्राणों पर आंच नहीं आने देनी थी, तो दूसरी तरफ जान की बाजी लगा कर अपने समाजबंधुओं के हितों की रक्षा करनी थी। इस संकट से पार पा सकूंगा इस बारे में मुझे आशंका नहीं थी, लेकिन स्थिति की गंभीरता को भांप कर सभी हिंदू नेताओं ने जो संतुलित सोच और सहयोग की नीति अपनाई, उसके कारण इस समस्या का संतोषजनक हल पाना आसान हुआ, इसकी मुझे बहुत खुशी है। सुलह की इस बातचीत का हल पाने का सारा श्रेय महात्मा गांधी को जाता है। मेरी सभी मांगों को स्वीकार कर आखिर गांधीजी ने मेरा ही अभिनंदन किया इसका मुझे बड़ा अचरज है। यह एक तरह से सुलह ही थी, जिसका दूसरे गोलमेज सम्मेलन के समय ही अगर महात्मा गांधीजी स्वीकार कर लेते तो इस तरह के कठिन और गंभीर हालात कभी भी पैदा नहीं होते। खैर। इस समझौते को मान्यता देने में मुझे बड़ी खुशी है। मेरे स्पृश्य बंधु इस समझौते को स्वीकार कर उस पर अमल करेंगे तो मुझे और मेरे