4. समाज जीवन में निरपेक्ष कर्तव्य भावना से संघर्ष करना चाहिए - मई 1924 मुंबई - Page 37

20 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

तक वे इस उम्मीद पर चुपचाप बैठे थे कि लिबरल उनका उद्धार करेंगे। लेकिन यह समझ में आने पर कि जो दूसरों पर निर्भर रहा वह डूबा जो जिसने जी-जान से मेहनत की वह सफल हुआ, इस तरह से प्रेरित हो उन्होंने अपना उद्धार स्वयं करने का फैसला किया। अपने इस काम के लिए उन्होंने वोट के अधिकार को महत्वपूर्ण स्थान दिया था और उस अधिकार को पाने के लिए अपनी सारी ताकत लगा दी। आखिरकार उनकी जीत हुई और वे सŸारूढ़ हुए और अपनी सोच के अनुरूप सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सुधार कर रहे हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि वोट का अधिकार बडे़ पैमाने पर हासिल हुआ। यदि हमने इस ढंग से कोशिश की तो हम भी प्रगति कर सकते हैं।

लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम जिस उद्देश्य को सामने रखते हैं उसके बुनियादी सिद्धांतों को अपने विरोधियों के सामने पेश कर देने भर से काम

खत्म नहीं हो जाता। जिन लोगों को किन्हीं भीषण हालात से गुजरना पड़ता है वे लोग पहले सिद्धांत पर वादविवाद करने लगते हैं। हर कोई ऐसा सैद्धांतिक विवाद करने लगता है कि, क्या हम मनुष्य नहीं हैं? कुŸो-बिल्लियां क्या हमसे ज्यादा श्रेष्ठ हैं? असल में इसमें गलत कुछ भी नहीं है, लेकिन कई लोगों को लगता है कि सिद्धांत बघार देने से हमारा काम हो गया और हम जीत गए। लेकिन यह भ्रम है। केवल सिद्धांत बघारने से काम नहीं चलता। क्योंकि सिद्धांतों का प्रतिपादन होते ही उसका अपने आप दुनिया पर असर नहीं होता। यह असर पैदा करना पड़ता है। इसलिए, असर पैदा करने के लिए केवल सिद्धांतों के प्रतिपादन के बजाय उन पर अमल के लिए आवश्यक संगठन तैयार करना उससे भी ज्यादा जरूरी है। जब तक संगठन नहीं बनता तब तक हम जिन सिद्धांतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं वे सिद्ध ांत हमारे विरोधियों को स्वीकार भी हो जाएं तो भी उन पर अमल नहीं होगा। और हमारी बातें अरण्यरोदन की तरह शुष्क साबित होंगे। जिस तरह भाग्य की गाड़ी को हांकने के लिए प्रयत्नरूपी सारथी होना चाहिए उसी तरह सिद्धांतों का प्रभाव पैदा करने के लिए संगठन होना जरूरी है।

यह सब देख कर मुझे लगता है कि हममें संघशक्ति पैदा करने के लिए हम सभी अस्पृश्य जातियों की एक विशाल संस्था होना जरूरी है। ऐसी संस्था बननी चाहिए। इस संस्था के जरिए दो तरह के काम होंगे - एक, हमारे सार्वजनिक कार्यों के लिए लगने वाला धन इकठ्ठा करना आसान होगा। एक कहावत है, कि ”गरीब की इच्छाएं पैदा होते ही मर जाती हैं।“ बहुत से लोगों को इस बारे में संदेह है कि हमारा समाज गरीब होने के कारण उसके द्वारा यह काम कैसे हो पाएगा? लेकिन मेरी राय में यह कहावत केवल व्यक्तियों पर लागू होती है, समाज पर लागू नहीं होती। बूंद-बूंद से समुद्र बनता है यह दूसरी कहावत भी सबने सुनी ही होगी।