4. समाज जीवन में निरपेक्ष कर्तव्य भावना से संघर्ष करना चाहिए - मई 1924 मुंबई - Page 38

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हमारा समाज हालांकि गरीब है मगर संख्या की दृष्टि से ताकतवर है। हममें से चौबीस लाख लोगों में से कम से कम दो लाख लोगों ने हर वर्ष आठ आने दिए तो हर वर्ष एक लाख रुपयों का कोष तैयार होगा और इसी तरह हर वर्ष एक लाख रुपए जमा होते रहे तो अपनी उन्नति होने में जरा भी समय नहीं लगेगा। लेकिन इसके लिए एक केंद्रीय संस्था होना जरूरी है। एक जिम्मेदार संस्था के जरिए एक स्थायी फंड इकट्ठा करने का काम होगा। इतना ही नहीं अपनी नीतियां तय करके उन्हें लोगों तक पहुचाना भी आसान हो जाएगा। आज हमारी हालत ऐसी है कि जिसे थोड़ी बहुत जानकारी होती है वह अपने आप को नेता समझने लगता है और उसे लगता है कि उसका नाम चमकना चाहिए। इतना ही नहीं तो कोई संस्था के जरिए काम करने को तैयार नहीं होता। कारण यह है कि संस्था में होने से उनका नाम नहीं चमकता। इस कारण हम असंगठित हैं हर कोई अपना नाम आगे करने के लिए सबूत दिखा रहा है। दूसरी बात यह है हालांकि हम इस देश में रहते हैं हम पर तरह-तरह के अन्याय किए जा रहे हैं। हम अल्पसंख्यक नहीं हैं, तब भी सरकार हमारी तरफ ध्यान नहीं देती या हमारी बातें सुनने को तैयार नहीं है। इसके विपरीत उनकी अगर इच्छा हुई तो वे हम पर दया करेंगे और कोई टुकड़ा डाल देंगे। मांगने से हमें कुछ नहीं मिलेगा, यह हमारा हाल है। मुसलमान लोगों का कितना पुचकारा जा रहा है! इसका कारण है उनकी संगठित शक्ति और संस्थाएं! यदि हमारी कोई संस्था होती तो अपने झूठे नेताओं पर लगाम लगा कर उन्हें एक दिशा देती। इतना ही नहीं, दूसरों के द्वारा हमारी जो उपेक्षा होती है, वह न हो पाती।

इस संस्था को फंड इकठ्ठा करके हमारे अस्पृश्य वर्ग में अंदरूनी सुधार करना शुरू करना चाहिए। केवल अस्पृश्यता के खिलाफ शिकायत करने का कोई लाभ नहीं होगा। हम भूल जाते हैं कि आज हिंदु समाज में जातिभेद के साथ-साथ गुणभेद भी हैं ही। और जातिभेद खत्म भी हो जाए, तो भी गुणभेद तो रहने ही वाला है। आज सभी अस्पृश्य वर्ग के लोगों को यदि ब्राह्मण भी कहा जाए तो भी उनमें से कोई व्यक्ति ना. परांजपे के बराबर बैठेने लायक भी नहीं हो पाए हैं। कारण यह है कि जातिभेद भले ही खत्म हो जाए तो भी गुणभेद बाकी हैं। कभी-कभी मुझे ऐसा लगता है यदि जातियों के बीच जो उतना गुणभेद बढ़ गया है। वह यदि इतना न बढ़ा होता तो यह जातिभेद इतने दिनों तक टिक नहीं पाता। कारण यह है कि सभी जातियों के लोग समान मात्रा में गुणवान होते तो वे एक जाति के वर्चस्व को कबूल नहीं करते. गुणभेद न होता तो जातिभेद कभी का जमींदोस्त हो गया होता। इसलिए मुझे हमेशा यह कहने की इच्छा होती है कि अन्य लोग जिस तरह हमसे जाति में श्रेष्ठ हैं उसी तरह वे व्यावहारिक गुणों में भी श्रेष्ठ हैं। इसलिए हमें अपने लोगों में व्यावहारिक गुणों की अभिव्यक्ति करने की कोशिश करनी चाहिए। और हममें से