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पुणे में हुए समझौते के बाद मुंबई में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का भाषण सुनने के लिए मुंबई का अखिल अस्पृश्य समाज बहुत ही उत्सुक था। सब इस मौके का बड़ी उत्सुकता से इंतजार कर रहे थे। वरली के रा सावंत आदि कुछ युवाओं ने बुधवार दिनांक 28 सितंबर, 1932 को रात में एक सभा का आयोजन कर यह मौका उपलब्ध करा दिया। करीब 10 बजे बाबासाहेब, सभा के नियोजित अध्यक्ष श्री देवराव नाईक और अन्य लोगों के साथ वरली बी. डी. डी. चाल के पास के मैदान में पधारे और तुरंत कामकाज शुरु हुआ। अध्यक्ष का चयन होने बाद अध्यक्ष श्री देवराव नाईक का भाषण हुआ। उन्होंने कहा,
महात्मा गांधी की घोर प्रतिज्ञा के कारण पूरा हिंदुस्तान हिल गया था और उनकी प्रतिज्ञा का स्वरूप इतना भयंकर था कि अस्पृश्यों के नेता डॉ. अम्बेडकर अगर उनकी बात मानते तो गांधीजी की जान खतरे में पड़ सकती थी। लेकिन गांधीजी की बात मान लेने का मतलब था कि इतने परिश्रम से अस्पृश्यों ने आत्मसुरक्षा के लिए जो भी कुछ हासिल किया था, उसे गंवा देना। और न मानने का मतलब था महात्मा गांधी की जान लेने का इल्जाम झेलना। ऐसी विपरीत स्थितियों में अस्पृश्य समाज, खासकर खुद डॉ. बाबासाहेब फंसे हुए थे। लेकिन अस्पृश्यों के सौभाग्य से इन दोनों बातों को ठीक तरह से हल करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने अपनी भूमिका निभाई। महात्मा गांधीजी के प्राण या अस्पृश्यों के स्वसुरक्षा के अधिकार गंवाने के संकट को उन्होंने मात दी। उनकी जीत पददलित समाज के उज्ज्वल भविष्य का द्योतक ही थी। आज अस्पृश्य समाज को वे अधिकार मिले हैं, जो उन्हें पहले कभी नहीं मिले थे यह बात सही है, लेकिन आज हिंदू समाज में सदियों से चली आ रही अस्पृश्यता कानूनन नष्ट हुई तो इन अधिकारों का फल पा लिया, इस भ्रामक कल्पना में न रहें। अस्पृश्य समाज आज पूरे हिंदू समाज को इस बात का विश्वास दिला दे कि जब तक हिंदू समाज का हिस्सा बन चुकी अस्पृश्यता को वे पूरी तरह मिटा नहीं देंगे, तब तक चैन की सांस नहीं लेंगे। अपना भाषण पूरा करने से पहले अध्यक्ष ने एक प्रतिज्ञा की कि, आज से चार महिनों के भीतर अगर जनता पत्र के पांच हजार सदस्य नहीं बने तो वे संपादक का पद भार स्वीकार नहीं करेंगे। ख्1,
उनके बाद डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर बोलने के लिए उठ कर खड़े हुए। करीब 15 हजार के उस प्रचंड जनसमुदाय ने तालियों की गड़गड़ाहट कर उनका स्वागत किया। डॉ. बाबासाहेब ने अपने उस भाषण में कहा था -
- जनता : 8 अक्तूबर, 1932