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आठ दिनों पहले अस्पृश्य समाज पर जो संकट मंडरा रहा था, उसका खुलासा अध्यक्ष ने अपने भाषण में किया ही है। आज उस संकट से अस्पृश्य समाज बाहर निकल चुका है। इतना ही नहीं, उस आपदा से शक्तिहीन न होते हुए वह आज और अधिक बलवान हुआ है।
पहले गोलमेज सम्मेलन के समय अस्पृश्यों के लिए हमने कुछ खास मांगें रखी थीं। आप उन मांगों के बारे में जानते ही हैं। दूसरे सम्मेलन में जब उन मांगों की बात निकली, तब सभी हिंदू प्रतिनिधियों ने तथा खुद महात्मा गांधी ने भी उन मांगों का कड़ा विरोध किया। ऐसे में अस्पृश्यों के अधिकारों की रक्षा का कोई मार्ग सामने नहीं था। सभी तरफ से जिन्हें समाज ने दलित बनाया हो, जो आर्थिक रूप से पंगू थे, धार्मिक रूप से कमजोर थे, सामाजिक दृष्टि से जो कीड़े-मकौड़े की तरह क्षुद्र माने गए थे और कूड़े-कचरे की भांति राजनीति में इस समाज को कुछ रियायतें देने के लिए अगर हिंदू समाज तैयार नहीं है, तो भावी स्वराज में जब राजनीतिक सŸा का बड़ा हिस्सा हिंदुओं के हाथ आएगा तब उस दुर्बल समाज का क्या होगा इस बात की चिंता मुझे घेर रही थी। उस समय मैंने सबको ताकीद दी कि अगर भावी समाज में अस्पृश्यों को जरूरी रियायतें नहीं मिलने वाली हैं तो ऐसे समाज के निर्माण के लिए वह अपनी सम्मति कदापि नहीं देगा। दूसरे सम्मेलन के समय मैंने अस्पृश्यों के लिए मांगें प्रस्तुत कीं। उन्हें प्रधानमंत्री तक पहुंचाया। इसके बावजूद प्रधानमंत्री ने जो न्याय किया उसमें मेरी मांग के अनुसार अलग चुनाव क्षेत्र केवल कुछ जगहों के लिए ही मंजूर हुआ था। अपनी मांग के अनुसार सारी जगहें भले हमें नहीं मिली थीं लेकिन जो कुछ मिल रहा था, उसी में संतोष किया जा सकता था। मुझे लग रहा था कि अब आगे के कामों के बारे में सोचना होगा। संकटों का सामना भले करना पड़ा लेकिन अस्पृश्यों के कल्याण का कुछ कार्य मेरे हाथों हुआ, ऐसा मुझे लगा था। मैंने राहत की सांस ली थी। जंगली जानवर के चंगुल से छूट कर जब कोई हिरन सुरक्षित जगह पहुंच कर राहत की सांस लेता है, कुछ उसी तरह की मेरी मानसिक स्थिति मेरी हुई थी। तभी महात्मा गांधी की प्रतिज्ञा के बारे में जानकारी मिली। अस्पृश्यों के सौभाग्य से इस बार महात्माजी ने विरोध नहीं किया था, बल्कि इस बार उनसे मुझे मदद मिली। इस बार महात्माजी ने काफी सहयोगपूर्ण नीति अपनाई थी। हिंदू नेताओं के साथ जो सुलह हुई उसमें अस्पृश्यों को काफी फायदा पहुंचा है। पंजाब प्रांत में अस्पृश्यों को आठ जगहें मिलीं, जबकि पहले उन्हें वहां एक भी जगह नहीं मिली थी। अन्य प्रांतों में भी और जगहें मिलीं। केंद्रीय विधिमंडल में अस्पृश्यों के लिए 18 प्रतिशत जगहें आरक्षित की गईं, यह दूसरा फायदा हुआ। इस बारे में प्रधानमंत्री ने जो न्याय किया था, उसमें कोई जिक्र नहीं था। उन्होंने जो निर्णय दिया था, उसमें अस्पृश्यों के लिए अत्यंत हानिकारक और जोखिम भरी