58. मंदिर जाने से आपका उद्धार नहीं होगा - सितंबर 1932 वरली (मुंबई ) - Page 373

356 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

एक कमी रह गई थी। 20 वर्षों के बाद ये सारी रियायतें अपने आप खत्म हो जाने वाली थीं। 20 सालों में स्थितियों में बहुत ज्यादा फर्क तो आने वाला नहीं था। इन बीस सालों में हजारों सालों से जो अत्याचार हो रहे थे, वे खत्म तो नहीं होने वाले थे। आम हिंदू समाज का नजरिया जब तक नहीं बदलता तब तक अस्पृश्यों के लिए लागू की गईं ये रियायतें वापिस लेना यानी जडें़ जमाने की कोशिश कर रहे पौधे को जड़ से उखाड़ने जैसा था। नए सुलहनामे के अनुसार यह बदला गया है। अब यह तय किया गया है कि हिंदू समाज और अस्पृश्यों की परस्पर सहमति से ही ये रियायतें खत्म की जाएंगी। हिंदू समाज अगर अपनी प्रत्यक्ष कृतियों से अस्पृश्यों का विश्वास हासिल करेगा तो अस्पृश्य अपने आप ये रियायतें छोड़ देंगे। वरना ये रियायतें लागू रहेंगी। यह सब तो ठीक है, लेकिन यह जो मौका मिला है उसका सही इस्तेमाल आप नहीं करेंगे तो अंधों के सामने रत्न रखने जैसी स्थिति होगी। जो कुछ मिला है उसका सही उपयोग आपको करना होगा। सŸा में अपनी भागीदारी का सही चित्र सामने आने के लिए आप स्वराज की अगली मुंबई विधि कौंसिल का चित्र आंखों के आगे ले आइए। किसी भी पार्टी के पास 200 में से 115 जगहें जब तक न हों, वह राज नहीं कर सकती। इस प्रांत में सबसे अधिक जगहें हिंदुओं के हिस्से आई हैं और वे लगभग 100 हैं। इन सौ को आपकी 15 जगहों के बगैर काम चलाना संभव नहीं होगा। मुसलमान या अन्य छोटे समूहों के बारे में तो बात करना भी बेकार है। मतलब यही कि आपके हाथ में अलौकिक शक्ति आई है। उसका इस्तेमाल आप अपनी आर्थिक उन्नति के लिए करें। एक और सूचना मैं देना चाहता हूं, जो महत्त्वपूर्ण है और उस पर ध्यान देना जरूरी है। आज हर जगह आपके लिए मंदिरों के दरवाजे खोले जाने के बारे में चर्चा है। इस काम को करने की इच्छा रखने वालों के अच्छे उद्देश्यों के बारे में मुझे कोई आशंका नहीं है। हालांकि आप यह न भूलें कि मंदिर में जाने से आपका उद्धार नहीं होने वाला है। मंदिर की मूर्ति के गिर्द डोलने वाली आध्यात्मिक भावना से अधिक पेट का गड्ढा कैसे भरा जाए, इस बारे में आपको ज्यादा सोचना चाहिए। खाने के लिए अनाज नहीं, तन ढंकने के लिए जरूरी कपडे़ नहीं, शिक्षा पाने की व्यवस्था नहीं, धन के अभाव के कारण बीमारी का इलाज करना संभव नहीं, ऐसी दीन-हीन स्थिति में हमारा समाज फंसा हुआ है। इन स्थितियों में बदलाव लाने वाले, जीवन के जरूरी सुख पाने के उद्देश्य को ध्यान में रख कर आपको अपना अगला कार्यक्रम तय करना होगा। जो राजनीतिक सŸा मिली है, उसका इस्तेमाल आपको इस दिशा में करना होगा। मंदिरों में जाने के मार्ग खुल गए, अस्पृश्यता हटी केवल इसलिए जो हक मिले हैं, उन्हें गंवाना ठीक नहीं होगा। ‘आज हमारी जो स्थिति है वह हमारे भाग्य का फल है’ जैसी मूर्ख और आत्मवंचक कल्पनाओं से अपने आपको मुक्त कीजिए। मुझे पक्का विश्वास है कि इस तरह की कल्पनाओं से छुटकारा पाकर हममें से हर व्यक्ति अगर राजनीति