59. भोलीभाली कल्पनाओं के कारण मृत्युलोक का जीवन कष्टकारक हुआ है - अक्तूबर 1932 मुंबई - Page 376

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शब्द और मुद्दों को कुशल कानूनविद की तरह पेश किया गया। कत्ल के मामले में फांसी पर लटकाए जाने वाले आरोपी का केस कोई कुशाग्र बुद्धि का वकील जिस तरह ज्यूरी के सामने पेश करेगा उसी कुशलता से वे हर विषय लोगों को समझाते हैं। ज्ञानाभिलाषी छात्रों को बडे़ जतन से विषय समझाने का उनका कौशल, जब वे अज्ञानी श्रोताओं को समझाते हैं, तब भी सहजता से प्रतिबिंबित होता है। शनिवार की रात उनका भाषण इसी तरह संस्मरणीय था। उन्होंने कहा,

मृत्यु के पश्चात् मोक्ष की प्राप्ति के लिए तड़पने वाली वृŸा हो, या काल्पनिक स्वर्गीय नंदनवन की प्राप्ति पर आशा भरी नजर हो, दोनों आत्मघातक हैं। मृत्युलोक का कष्टकर जीवन उन भोली-भाली कल्पनाओं के कारण ही कष्टमय हुआ है।

खुद के बल पर पोषक आहार कमाना, ज्ञानार्जन के साधन प्राप्त करना और अन्य तरह से जीवन सुखमय बनाना आदि महत्वपूर्ण मुद्दों की तरफ बहुजन समाज का ध्यान नहीं रहा, इसीलिए पूरे देश की प्रगति पर इसका बुरा असर हुआ है इसका रोजमर्रा की जिंदगी के अनुभवों से हमें पता चलता है। गले में पहनी तुलसीमाला के सहारे आप मारवाड़ी के कैंची के समान ऋण से मुक्त नहीं हो सकते, या राम नाम के जाप करते हैं, इसलिए मकान-मालिक आपको किराए में छूट नहीं देता और न ही दूकानदार अपना पैसा कम करता है। आप नियम से पंढरपूर की यात्रा करते हैं, इसके लिए आपका मालिक आपकी तनख्वाह बढ़ाता नहीं। समाज के बडे़ हिस्से के इन मूढ़ कल्पनाओं में खो जाने के कारण कुछ स्वार्थी लोगों को उनके बुरे इरादों में सफलता मिलती है। वे आपके कामों में रुकावटें खड़ी करते हैं और अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं। इसलिए कम से कम अबके बाद तो सतर्कता बरतें। आज आप लोगों को थोड़ी बहुत राजनीतिक सŸा मिल रही है। अब अगर आप सŸा के प्रति उदासीन रहे, अपनी आज की स्थिति में परिवर्तन लाने के लिए कोई उपाय आपने नहीं किए तो आपका हाल बुरा होगा, इसमें कोई शक नहीं। अगर आपने अपनी सोच को ”पुराने दिन ही अच्छे थे जब दाल-रोटी से गुजारा हो जाता था“ तक सीमित रखा तो आपकी स्थिति में कभी सुधार नहीं आ सकता है। जीवन में तरक्की ले आने के लिए इस तरह की सोच से मुक्ति पाना आवश्यक है। इस तरह की मानसिकता और उदासीनता घातक साबित होगी। मुझे आशंका इसी बात की है कि आज हममें जो जागरुकता पैदा हो रही है, वह अगर क्षणि् ाक साबित होकर यहीं खत्म हो गई तो क्या होगा? जिस गुलामी को नेस्तनाबूत करने के लिए हमने कोशिश की, फिर से आप कहीं उसी के चंगुल में तो नहीं फंस जाओगे? अब तक वैष्णवपंथ के संतों ने आपको समानता के पायदान पर ले आने की कोशिशें कीं लेकिन उनकी सीख पूरी की पूरी आध्यात्मिक, पारमार्थिक होने के कारण तथा वे खुद ऐहिक सुखों से अछूते रहे, इस वजह से वे अपने समाज में