59. भोलीभाली कल्पनाओं के कारण मृत्युलोक का जीवन कष्टकारक हुआ है - अक्तूबर 1932 मुंबई - Page 377

360 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अपना दरजा बना नहीं सके। उनकी सीख से आपकी गुलामी की हालत में रŸाभर का फर्क नहीं आया है। हिंदुस्तान का बहुजनसमाज राजनीति से अलग रहने के कारण आज देश की दुर्दशा हुई है।

इसीलिए, हमें इस गलती को दोहराना नहीं है। हमें बड़ी सावधानी से अपने अगले कार्यक्रमों की रूपरेखा बनानी है। शिक्षा एवं अस्पृश्यों की उन्नति में बहुत घनिष्ठ संबंध है। मुंबई शहर में उनकी संख्या करीब दो लाख के आसपास है। मुंबई में प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था म्युनिसिपल कार्पोरेशन स्कूल कमेटी के हाथ है। साल भर में कमेटी का खर्च 30-32 लाख रुपयों तक होता है। इस खर्चे में अस्पृश्य लोगों के लिए क्या व्यवस्था की गई है? भिन्न-भिन्न स्कूलों में अध्यापकों की नियुक्तियां की जाती हैं, उनमें अस्पृश्य अध्यापकों की भी नियुक्तियां की जाती हैं अथवा नहीं, आदि अस्पृश्यों के हितों से संबंधित कई अहम सवाल हैं। इन सवालों को कैसे हल किया जाता है इस पर नजर रखने के लिए अस्पृश्यों का कम से कम एक प्रतिनिधि स्कूल की कमेटी में होना आवश्यक है। इस सीधी-सादी मांग का कोई क्यों विरोध करे, यह मेरी समझ से बाहर है। इधर विधि परिषद में ग्राम पंचायत बिल चर्चा के लिए रखा गया है। इस बिल के अनुसार पंचायत को छोटे-छोटे फौजदारी और दीवानी मुकदमों में न्यायदान का अधिकार दिया गया है। पंचायत के सदस्यों का चुनाव लोग करेंगे। इस तरह चुनाव जीत कर आने वाले लोगों के निष्पक्ष होने के बारे में शक है! हर गांव में अस्पृश्यों की संख्या उसी गांव के रहने वालों के अनुपात में बहुत कम होने और उनके पूरी तरह निर्भर होने के कारण इस ग्राम पंचायत के संविधान में जब तक अस्पृश्यों के लिए कोई स्वसुरक्षा की योजना नहीं होगी तब तक इस समाज के साथ क्या होगा, क्या नहीं होगा कहा नहीं जा सकता। वरली की सभा में जो घोषणा की गई थी उसके अनुसार संगठित रूप से काम करने के लिए एक केंद्रीय संस्था की स्थापना की जानी है। इस तरह की संस्था के अभाव में अस्पृश्य समाज के लोगों की शिकायतों पर ध्यान नहीं दिया जाता। कहीं अस्पृश्यों को मराठों ने पीटा, कहीं उनके बच्चों को परेशान किया, कहीं जमीन छीन ली गई, इस तरह की कई शिकायतें होती हैं। एक गांव में ऐसे ही किन्हीं कारणों से तहसीलदार ने गांव के कर्मचारी महार को शो कॉज नोटिस देकर जवाब मांगा क्योंकि कनिष्ठ अफसरों नें झूठी शिकायत की थी कि महार सरकारी काम नहीं करते, जबकि महारों ने सरकारी काम करने से कभी भी इनकार नहीं किया था। तहसीलदार के सामने उन्होंने इस आशय का जवाब भी दिया। लेकिन तहसीलदार ने उल्टा जवाब दर्ज किया और महारों के वतन जब्त करने की शिफारिश की। वरिष्ठ अधिकारियों का भी वही हाल होता है। कोई भी महारों की बात मानने के लिए तैयार ही नहीं हुआ। आखिर कुछ सालों