362 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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महार समाज सेवा संघ (राजापूर से गोवा की सरहद तक) के सहयोग से 22
अक्तूबर, 1932 के दिन शाम 7 बजे सावंतवाडी के जेल के पास वाले महारों की
बस्ती में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के स्वागत और अभिनंदन के लिए अस्पृश्यों की
बड़ी सभा बुलाई गई थी। उस दिन धुआंधार बारिश हो रही थी। हर पांचवें मिनट
में बारिश की झड़ी लग रही थी। संघ के लोगों ने बड़ी मेहनत से मंच बनाया था।
करीब हजार-बारह सौ स्पृश्य और दो हजार के आसपास अस्पृश्य लोग सभा के
लिए इकट्ठा हुए थे। अध्यक्ष पद की सूचना लेकर शिवराम नारायण वालावलकर मंच
पर आए और गणपत जाधव से अनुमोदन पाने के बाद अध्यक्ष स्थान पर बाबासाहेब
घोरपडे़ को आमंत्रित किया। अध्यक्ष के स्थान ग्रहण करने के बाद डॉ. बाबासाहेब
का परिचय दिया गया और डॉ. बाबासाहेब से दो शब्द कहने की विनति की गई।
बाबासाहेब बोलने के लिए उठ कर खडे़ हो गए। तालियों की गड़गड़ाहट हुई।
आकाश में बादल छाए हुए ही थे। बाबासाहेब ने यूंही आकाश की तरफ देखा और
वे बारिश को संबोधित कर बोले-
”मेघराजा, केवल दस मिनट कृपा करना।“ उसके बाद बाबासाहेब ने छोटा-सा
लेकिन बहुत ही मार्मिक और चटपटा भाषण दिया। अपने भाषण में डॉ. बाबासाहेब
ने अस्पृश्य बंधुओं से कहा कि, ”उन्नति के मार्ग पर चलने के लिए अपने ही पैरों पर
भरोसा कीजिए और उन्हें उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ाइए। उन्होंने कहा कि मुठ्ठीभर
प्रगतिशील लोग पिछडे़ हुए बहुसंख्यकों पर, अस्पृश्यों पर जुल्म ढाते हैं। इस स्थिति
को बदलने के लिए क्या किया जाए इस बारे में चार शब्द उन्होंने सुनाए। निस्वार्थ
बनने के लिए और आत्मरक्षा के लिए ही सही प्रगतिशील पढ़े-लिखे लोगों को चाहिए
कि वे छुआछूत को हटा दें और सबके साथ समान बर्ताव करें। उसके बाद उन्होंने
जो कहा उसका अर्थ यही था कि ऐसा न करके हिंदू समाज अपने हाथों पत्थर
उठा कर अपनी ही नाक को कुचल रहा है, अपनी ही बेइज्जती करवा रहा है। इस
तरह वे ठीक दस मिनट बोले। उसके बाद वे बैठे। फिर अध्यक्ष से इजाजत लेकर
वहां से निकले और अपनी मोटर में बैठ गए। फिर वहां धुआंधार बरसात शुरू हुई।
अगले पांच मिनट तक बारिश होती ही रही। ख्2,
* जनता : 5 नवंबर, 1932
- ‘जनता’, 1 मई, 1954 में प्रकाशित ”प्रकृति पर (बारिश पर) नियंत्रण“ शीर्षक का श्री बी.एस. जाधव
का संस्मरण।