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शुक्रवार दिनांक 28 अक्तूबर, 1932 के दिन मुंबई के अपोलो बंदरगाह में सर
कावसजी जहांगीर हॉल में अस्पृश्य वर्ग के नेता डॉ. पी. जी. सोलंकी की अध्यक्षता
में हुई एक सभा में अखिल भारतीय अस्पृश्य वर्ग के नेता डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर
को आमंत्रित किया गया था। इस सभा में उन्हें मुंबई के ऋषी समाज की ओर से
मानपत्र दिया जाना था। सभा की जगह पर व्यवस्था ठीकठाक रखने के लिए समता
सैनिक दल के स्वयंसेवक उपस्थित थे।
मानपत्र का स्वीकार करने के बाद डॉ. अम्बेडकर ने कहा,
”यह मानपत्र केवल मुझे ही अकेले को दिया जा रहा है, इस बात के लिए मैं
क्षमाप्रार्थी हूं। अछूत वर्ग का जो भी काम हो रहा है वह सब केवल मुझ अकेले से हो
रहा है यह किसी का कहना हो तो वह झूठ है। इस काम के लिए जितना श्रेय आप
मुझे दे रहे हैं उससे ज्यादा श्रेय डॉ. सोलंकी और मेरे साथ काम करने वाले लोगों
को दिया जाना चाहिए। डॉ. सोलंकी मेरे साथ काम करते हैं। पिछले तीन सालों में
मैंने कौंसिल में कुछ भी काम नहीं किया। लेकिन डॉ. सोलंकी साहब ने कौंसिल में
अस्पृश्य वर्ग की बहुत मदद की है। पुणे में हिंदू नेताओं के साथ हमारी जो बातचीत
हुई उस दौरान भी डॉ. सोलंकी ने मेरी बहुत बहुत मदद की। यह उनका बड़प्पन
है कि जो मानपत्र उन्हें दिया जा रहा था, वह मुझे दिया जाना चाहिए, ऐसा उन्होंने
इस सभा के आयोजकों से कहा। आखिर मैं आप लोगों से यही कहना चाहता हूं कि,
पुणे में हिंदू नेताओं के साथ जो अनुबंध हुआ उसके अनुसार हमारा जो भी फायदा
हुआ है, उसका उपयोग हमारे लोग कैसे करवा लेंगे यह मेरी समझ में नहीं आ रहा
है। संसार में मानव को जो सुख-दुख भोगना पड़ता है, वह सब ईश्वर की इच्छा
के अनुसार ही होता है। अपनी दारिद्रता अपने ही लिए बनी है ऐसा लोग मानते हैं।
इसके लिए मैं सभी लोगों से कहना चाहता हूं कि इस तरह अपने आप को नीच
मानने की आदत छोड़ दें। एक बात ध्यान में रखें कि राजनीतिक क्षेत्र में जो यह
बड़ा बदलाव हुआ है, उसे उच्च वर्ण के हिंदू लोगों को स्वीकार्य नहीं हैं इनकी नजर
में इसकी कोई कीमत नहीं है। वे लोग इस देश के राज्यकŸार् बने हैं। उसके लिए
फिर हिंदू लोगों की गुलामी में हमें जकड़ने की स्थिति नहीं आएगी, क्योंकि इससे
आगे जो भी कानून बनेंगे वे अस्पृश्यों की सहमति से ही बनेंगे। यह एक सामाजिक
क्रांति है। मैं आपको बता दूं कि अस्पृश्य वर्ग को जो अधिकार मिले हैं, उन्हें लूटने
जनता : 5 नवंबर, 1932