4. समाज जीवन में निरपेक्ष कर्तव्य भावना से संघर्ष करना चाहिए - मई 1924 मुंबई - Page 39

22 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कई लोगों को सखेद आश्चर्य होता है कि हम लोग जाति-भेद के कारण आगजनी वगैरा नहीं करते, अपने पर होने वाले अन्याय को खत्म करने के लिए हंगामा नहीं करते। लेकिन इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। हम यह नहीं कर पाते आदि आक्रोश युक्त बातें सुन कर भी हम उŸोजित नहीं होते तो इसका कारण यह है कि उन्हें इस अन्याय का अहसास नहीं है। यदि कोई मनुष्य किसी पद के लिए योग्य होने पर जाति-भेद के कारण उसे वह पद प्राप्त नहीं होता तो ऐसे आदमी को जाति भेद का दंश महसूस होता है। यह उसे अनुभव होने लगता है और वह आंदोलनों के मार्ग को समझने लगता है और उसका समर्थक बन जाता है। जो उस पद तक जाने के योग्य नहीं होगा, उसे जाति भेद का उग्र स्वरूप कैसे समझ में आएगा? जाति-भेद हो या न हो, वह जहां है वहीं रहेगा। इसलिए हमारे लोगों की योग्यता बढ़ाने की हमें चिंता करनी चाहिए। यदि गुणों में समता आई तो जाति-भेद में समाई हुई अस्पृश्यता बहुत दिनों तक टिक नहीं पाएगी।

हमारे समाज को इस तरह तैयार होना चाहिए फिर हम जिस तरह की सामाजिक या आर्थिक स्थिति चाहते हैं, उस स्थिति को प्राप्त करने में हमें ज्यादा समय नहीं लगेगा। हो सकता है आपको यह विचार बचकाना लगे, लेकिन मुझे इसमें काफी तथ्य नजर आता है।

अभी का समय इस देश की दृष्टि से आपतकाल जैसा है। 1917 में जब स्वराज्य की नींव डालने की शुरुआत हुई तब से इस देश में तीन ख्ेमे बन गए हैं- 1) यूरोपीयन लोगों का; 2) मुस्लिम लोगों का; 3) हिंदुओं का। 1917 से पहले राजनीतिक मामलों में हिंदू और मुसलमानों का 36 का आंकड़ा था, अब वह 63 का हो गया है और दोनों में भयंकर प्रकार का सगापन पैदा हो गया है। दोनों ने एकजुट होकर अंग्रेजों से स्वराज्य की पहली किस्त ली है। लेकिन बंटवारे के समय भाइयों में भी तनाव पैदा हो गए हैं। स्वराज्य मांगने पर किसको बड़ा हिस्सा मिलेगा यह संघर्ष का मुद्दा बन गया है। इस सवाल का जवाब यही है कि जिसकी जनसंख्या ज्यादा होगी उसे ही स्वराज्य का ज्यादा हिस्सा मिलेगा। मुसलमानों को अपनी जनसंख्या ज्यादा हो यह लगना स्वाभाविक है। उसी तरह यह भी स्वाभाविक है कि हिंदू सोचें कि वह कम न हों। दोनों पक्षों की नजर हम पर है। हमारे सिवाय न मुसलमानों को विजय मिल सकती है और न हिंदुओं की नैय्या पार लग सकती है। आज अगर हम हिंदू रहे तो ही आर्य धर्म की संस्कृति इस देश में जीवित रहेगी। इसके विपरीत अगर हम हिंदू से मुसलमान हो गए तो इस देश में यवन संस्कृति का बोलबाला होगा। यह बात आज हिंदू और मुसलमान दोनों ही जानते हैं। यदि ऐसा न होता तो वायकोम में ब्राह्मण वर्ग अस्पृश्य जातियों के लिए सत्याग्रह करने को तैयार न होता। या मुस्लिम लोग करोड़ों रुपए खर्च करके हमें उनके धर्म की दीक्षा देने को उत्सुक