61. परंपरा से चले आ रहे कामों को छोड़, शिक्षा पाने की कोशिश करें - अक्तूबर 1932 मुंबई - Page 381

364 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

की कोशिश उच्च वर्ग के हिंदू करेंगे। समता की बुनियाद पर महात्मा गांधीजी के साथ मिल कर जो सुलहनामा तैयार किया गया है, वह हिंदू लोगों को पसंद नहीं है, यह मैं जान चुका हूं। गांधीजी ने अनशन किया तो उन्हें बचाने के लिए ही हिंदुओं को इस सुलहनामे को मानना पड़ा था। इसके बावजूद मुझे डर है कि हमारे हाथ आई सŸा को झटक लेने की कोशिश वे करेंगे। मैं उम्मीद करता हूं कि हाथ आई सŸा को आप यूँही गंवा नहीं देंगे।

दूसरी एक और महत्त्वपूर्ण और अपनेपन की सूचना मैं आपको दे रहा हूं कि मैं सहभोजन और मंदिर प्रवेश के खिलाफ नहीं हूं। लेकिन आपको इस राह से राजनीतिक अधिकार नहीं मिलेंगे। आपको घर को चलाने की आवश्यकता है। हमें रोटी, बदन पर कपड़ा, रहने के लिए अच्छे घर की जरूरत है। जिस तरह उच्च वर्ण के हिंदू लोग अपने बच्चों को शिक्षा देते हैं, उसी तरह अपने बच्चों को शिक्षा देने की बेहद जरूरत है, और उनकी तरह हमें भी सभी तरह की सरकारी नौकरियों के क्षेत्र में प्रवेश की कोशिश करनी चाहिए। हम अगर यह करने में सफल रहे तभी हमारा कल्याण होगा।

आखिर में ऋषि मंडली को मैं एक ममताभरी सूचना देता हूं कि अपने अस्पृश्य वर्ग में जो जाति भेद हैं, उन्हें खत्म करने की हमें कोशिश करनी चाहिए। अस्पृश्यों में सामाजिक सुधार की कोशिशें करनी चाहिएं। बुनियाद मजबूत हो तो घर लंबे समय तक टिका रहता है। ऋषी समाज अस्पृश्य वर्ग की बुनियाद है। इसीलिए उनका कार्य अस्पृश्य वर्ग के लिए आदर्श रूप होना चाहिए। ऋषि समाज यदि घोषणा कर दे कि न हम किसी जाति, छोटी जात के हैं और न हम किसी ऊंची जात के हैं, तो अस्पृश्य वर्ग में बहुत जल्द सुधार होने लगेंगे। दूसरी बात यह कि, उच्च वर्ण के लोगों ने हमें यह सोचने की आदत डाल रखी है कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी भंगी (मेहतर) का काम करना हमारा ही काम है। इसी वजह से हमारी मानसिकता, मनोवृŸा ऐसी हुई है। लेकिन मैं आपको साफ-साफ बता देता हूं कि हमारी ऐसी मानसिकता बनने के लिए हमारी आर्थिक स्थिति ही जिम्मेदार है। भंगी का काम पीढ़ी-दर-पीढ़ी करने वालों को अब यह काम करना छोड़ देना चाहिए। अच्छी शिक्षा हासिल करनी चाहिए।

अपनी स्थिति में यदि कुछ फेरबदल परिवर्तन करने हों तो अस्पृश्यता को जड़ सहित नष्ट करना होगा। तभी हम कोई बदलाव ला सकते हैं। इसीलिए उच्च वर्ण के हिंदुओं की बातों पर ज्यादा ध्यान देने के बजाय, हमें अपने कल्याण के बारे में सोचना चाहिए। खैर, आपने आज मुझे जो मानपत्र दिया है उसके लिए आभार व्यक्त कर मैं अपना भाषण समाप्त करता हूं।“