369
64
भाग्य पर भरोसा करके ना बैठिए, जो करना हो वह अपनी भुजाओं
के बल पर करिए
शनिवार, दिनांक 18 फरवरी, 1933 के दिन कसारा में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर
की अध्यक्षता में ठाणे जिला परिषद हुई थी। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर मुंबई से
कार से 8 बजे कसारा पहुंचे थे। उनके साथ श्री शिवतरकर, दिवाकर पगारे और
गणपतबुवा जाधव उर्फ मडकेबुवा आए थे। कसारा में बाबासाहेब का स्वागत करने
के लिए कल्याण के समता सैनिक दल के वालंटियर और आसपास के गांवों से
आए प्रतिनिधि मौजूद थे। नासिक से मेसर्स भाऊराव गायकवाड़, के. बी. जाधव,
लिंबाजीराव भालेराव और रोकडे उपस्थित थे। डॉ. अम्बेडकर की मोटर में शोभायात्रा
निकाली गई थी। शोभायात्रा मंडप में पहुंची तब परिषद के काम की शुरुआत हुई।
शुरूआत में परिषद के स्वागताध्यक्ष शंकरनाथ बर्वे ने उपस्थितों का स्वागत किया
और प्रस्ताव रखा कि डॉ. अम्बेडकर से अध्यक्ष स्थान ग्रहण करने की विनति की
जाए। उसका रोकडे़ द्वारा समर्थन किए जाने के बाद डॉ. अम्बेडकर ने तालियों की
गूंज में अध्यक्ष स्थान ग्रहण किया।
डॉ. अम्बेडकर ने अपने भाषण में कहा,
इससे पहले मैं कभी ठाणे जिले में आ नहीं पाया था। इस वजह से आपसे
मेरा परिचय बढ़ा नहीं। उसे बढ़ाने की कोशिश के लिए तथा ठाणे जिले के सभी
प्रतिनिधियों से मुलाकात का यह अवसर निर्माण करने के लिए महंत शंकरदास
बुवा का मैं शुक्रगुजार हूं। आज मैं महत्वपूर्ण सवालों के बारे में बहुत कम और
सूचनात्मक बोलने वाला हूं। आप ध्यान से सुनेंगे ऐसी उम्मीद रखता हूं। आज आपने
जो कुछ भी कमाया है, उसके बारे में सोचेंगे तो एक अलग बात भी आपके ध्यान
में आएगी। महात्मा गांधी और अन्य सनातनी लोगों के साथ अस्पृश्यता नष्ट करने
को लेकर पिछले आठ दस दिनों से मेरी बातचीत चल रही है। महात्मा गांधीजी ने
अस्पृश्यता निवारण करने के लिए मंदिर खोलने के और अस्पृश्यता को धो डालने के
कार्यक्रम चलाए हैं। मंदिर प्रवेश के बारे में मैंने एक पत्रक प्रसिद्ध किया है। उसमें
मैंने साफ-साफ लिखा है कि अस्पृश्यता नष्ट करने के लिए जरूरी नहीं कि मंदिर
प्रवेश कराया जाए। हमें हिंदू धर्म में समानता चाहिए, चातुर्वर्ण्य नष्ट होने चाहिए,
तभी हम मानेंगे कि हिंदू धर्म हमें स्वीकार कर रहा है। महात्मा गांधी और मुझमें
यही फर्क है। सनातनी लोग चातुर्वर्ण्य हटाने के लिए तैयार नहीं हैं। मंदिर खोलने
* जनता : 25 फरवरी, 1933